पंजाब में नहीं मिल रहे बाहरी मजदूर, बिगड़ी खेती बाड़ी


पंजाब में नहीं मिल रहे बाहरी मजदूर, बिगड़ी खेती बाड़ी

पंजाब में इस वक्त नहीं मिल रहे हैं बाहरी मजदूर। इससे प्रभावित हो रही है राज्य की कृषि। दरअसल क्या है माजरा। पिछले दिनों पंजाब के मुक्तसर जिले के वट्टू गांव में दो किसानों के बीच लड़ाई हो गई। लड़ाई का कारण आपसी झगड़ा नहीं था, जमीन के खातिर भी नहीं, फसल को लेकर भी लड़ाई नहीं थी। तो क्या वजह थी कि दो किसान आपस में भिड़ गए। ये किसान भिड़े थे आपस में अपने खेतों में बुआई के लिए श्रमिकों को लेकर।

 

दरअसल, इन दिनों पंजाब में पिछले साल की तरह इस बार भी प्रवासी मजदूर का आना काफी कम हो गया है। तो क्या अब पंजाब और हरियाणा के खेत व मंडी मजदूरों के बिना विरान होंगे। कृषि आधारित पंजाब और हरियाणा की अर्थव्यवस्था बिहारी मजदूरों के बिना संभव है। क्या इन मजदूरों को अब अपने प्रदेश में काम मिलने लगा है। इस बार पंजाब में बिहारी मजदूर मौसमी खेती करने नहीं आए। पंजाब में हाहाकार मचा हुआ है।

 

मजदूरों की कमी के कारण कृषि बुरी तरह प्रभावित हुई है। पंजाब में बुआई के लिए साढे सात लाख मजदूरों की जरूरत होती है, जबकि इस साल अब तक पांच लाख मजदूर ही मुहैया हो पाए हैं। मजदूरों की मांग की तुलना से कम उपलब्धता ने उनकी मजदूरी का भाव आसमान पर पहुंचा दिया है। बताया जा रहा है कि इस वक्त प्रति मजदूर पांच सौ रुपए तक दिया जा रहा है। मजदूरों को इस दर से भुगतान करने पर पंजाब के किसानों और उद्योगों का गणित बिगड़ सकता है।

 

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जानकारों के मुताबिक पंजाब में 26 लाख हेक्टेयर यानी 65 लाख एकड़ जमीन पर केवल धान की बुआई लगातार डेढ़ महीने तक चलती है। चार-पांच मजदूर एक दिन में एक एकड़ खेत में बुआई करते हैं। मजदूरों की कमी के कारण प्रति एकड़ बुआई की मजदूरी पिछले साल के पंद्रह सोलह सौ रुपए के मुकाबले दो हजार रुपए तक पहुंच चुकी है।

 

पिछले साल भी पंजाब में धान बाई के दौरान प्रवासी मजदूरों की किल्लत हो गई थी और एक एकड़ बुआई की मजदूरी आठ नौ सौ रुपए से उछलकर पंद्रह सोलह सौ रुपए तक जा पहुंची थी। अर्थशास्त्री रमेश अरोड़ा कहते हैं कि वट्टू गांव में दो किसानों के बीच इसलिए गोली चल गई कि एक किसान ने दूसरे के खेत में काम कर रहे मजदूरों को अधिक पैसे देकर अपने खेत में बुआई के लिए बुला लिया।

 

जाहिर है कि इस साल फिर पिछले साल की तरह बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आने वाले मजदूरों की भारी कमी है। उन्होंने बताया कि पिछले हफ्ते पंजाब के एक अखबार में बिहार सरकार की तरफ से अपने मजदूरों से प्रदेश लौटने की अपील की गई थी और उन्हें ब्लू कार्ड स्कीम के तहत छत्तीस सौ रुपए प्रति माह देने की बात कही गई।

 

पंजाब के किसान रविंद्र आहूजा कहते हैं पंजाब के किसान इन दिनों सुबह-सुबह मजदूरों की तलाश में आसपास के बस स्टैंड और रेलवे स्टेशनों की खाक छान रहे हैं अपनी पेशकश में वे मजदूरों को अधिकतम मजदूरी के साथ उनके रहने खाने के उम्दा इंतजाम की पेशकश कर रहे हैं। आखिर बिहार के विकास और पंजाब की खेती में क्या संबंध है। यह सवाल बेमानी नहीं है। अभी पंजाब के किसान अपनी खेती क लेकर चिंतित हैं।

 

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कारण है बिहार में चल रहे विकास कार्य। बिहार में निर्माण कार्यों के कारण बेरोजगारों को लगातार काम मिल रहा है। उसकी वजह से वे मजदूर जो पंजाब का रुख करते थे, इस बार बिहार आने पर दोबारा पंजाब नहीं लौटे। इससे पंजाब में धान की रोपाई के लिए मजदूरों का संकट हो गया। इस बारे में बिहार किसान आयोग के पूर्व अध्यक्ष रामाधार कहते हैं कि प्रदेश में बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी परियोजनाओं के साथ लघु उद्योगों की संख्या में बढ़ोत्तरी से बिहार के कामगारों का रुझान दूसरे राज्यों के प्रति कम हुआ है और इस साल भी काम मिलने से वे पलायन के मूड में नहीं है।

 

कई अखबारों ने एक फोटो छापी कि जालंधर रेलवे स्टेशन पर एक संपन्न किसान विपन्न से दिख रहे मजदूर का हाथ जोड़कर रोक रहा है। हाथ जोड़ने का कारण है कि यहां की खेती और इंडस्ट्री बिहार, यूपी के मजदूरों पर निर्भर है। आतंकवाद के समय में भी जब स्थानीय लोग खेतों पर नहीं जाते थे या पलायन कर गए, तब भी इन्हीं मजदूरों ने यहीं की अर्थव्यवस्था को संभाले रखा। हरित क्रांति की नींव बिहार-यूपी के मजदूरों की मेहनत पर ही रखी गई।

 

उस दौरान बिहार, यूपी के काफी मजदूर आतंकियों की गोलियों के शिकार बनें, लेकिन इसेक बदले उन्हें कोई महत्व नहीं मिला। पुलिस ने भी उनकी हत्याओं को अपने रिकार्ड में दर्ज नहीं किया। कोई सामाजिक संस्था भी नहीं दिखती, जो पंजाब में पुरबियों की स्थिति पर जमीनी तौर पर काम कर रही हो। यहां के विकास मे इस योगदान के बावजूद पंजाब में बिहार, यूपी के लोगों को भैया कहा जाता है। ये बड़े भाई के समान आदर भाव वाला शब्द नहीं है। इसे वे गाली के अर्थ में प्रयोग करते हैं। उन्हें भैयों की जरूरत है, वे उन पर भरोसा भी करते हैं, पर यह बर्दाश्त नहीं करते कि वह मजदूर के स्तर से ऊपर का जीवन जिए।

 

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इस मंत्री ने गलती से ली मुख्यमंत्री पद की शपथ, हुए ट्रोल


इस मंत्री ने गलती से ली मुख्यमंत्री पद की शपथ, हुए ट्रोल

आज सुबह से सोशल मीडिया पर एक खबर को काफी तेजी से वायरल किया जा रहा है. दरअसल, कर्नाटक में BS येदियुरप्पा के नेतृत्व वाली BJP सरकार के मंत्रियों ने बीते मंगलवार को पद और गोपनीयता की शपथ ली. इस दौरान जब BJP नेता और विधायक मधु स्वामी पद और गोपनीयता की शपथ ले रहे थे, तभी उन्होंने गलती से बतौर मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली. 

 

 

बता दें कि, मधु स्वामी जब शपथ ले रहे थे तो उन्हें मंत्री बोलना था, लेकिन जुबान फिसलने के चलते वह मुख्यमंत्री बोल पड़े. अब इस खबर को सोशल मीडिया पर काफी ट्रोल किया जा रहा है. खास बात ये है कि इस दौरान CM येदियुरप्पा भी मौके पर मौजूद थे और मधु स्वामी की इस गलती पर मुस्कुरा दिए. इतना ही नहीं येदियुरप्पा ने मधु स्वामी को बाद में गले भी लगाया.

 

गौरतलब है कि, बीते मंगलवार को हुए शपथ ग्रहण समारोह में राज्यपाल वजुभाई वाला ने 17 विधायकों को मंत्री पद की शपथ दिलायी. जिन विधायकों को मंत्री पद से नवाजा गया है, उनमें बी. श्रीरमुलु, सीटी रवि, पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केएस ईश्वरप्पा और पूर्व सीएम जगदीश शेट्टार का नाम शामिल है. बता दें कि, येदियुरप्पा के 26 जुलाई को CM बनने के बाद उनके मंत्रिमंडल का यह पहला विस्तार है. उन्होंने 29 जुलाई को विधानसभा में अपनी सरकार का बहुमत साबित किया था. 

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22 वर्ष पहले दफ़न हुए व्यक्ति का नहीं गला शरीर, मिला ज्यों का त्यों


22 वर्ष पहले दफ़न हुए व्यक्ति का नहीं गला शरीर, मिला ज्यों का त्यों

उतर-प्रदेश के बांदा जिले से एक अजीबोगरीब मामला सामने आया है, कई लोग इसे देखकर खुदा का करिश्मा मान रहें हैं तो वहीं कई लोग नेक इंसाल का दर्जा दे रहें हैं. बताया जा रहा है कि, यहां 22 वर्ष पहले कब्र मे दफनाए गए एक शख्स का जनाजा ज्यों का त्यों पड़ा मिला है.

 

ये मामला तब सामने आया जब मूसलाधार बारिश के चलते कब्रिस्तान में मिट्टी कटने से एक कब्र धंस गई और उसमें  22 वर्ष पहले दफन एक शख्स का कफन में लिपटा जनाजा़ दिखने लगा. यहां देखते ही देखते मौके पर काफी लोगों पहुंच गए. जब कफन में लिपटी लाश को निकाला गया तो वहां मौजूद सैकड़ों लोग देखकर दंग रह गए. क्योंकि 22 सालों बाद भी लाश ज्यों कि त्यों निकली.

 

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दरअसल, ये मामला उतर-प्रदेश के जिले बांदा के बबेरू कस्बे के अतर्रा रोड स्थित घसिला तालाब के कब्रिस्तान की है. यहां मूसलाधार बारिश से कई कब्रों की मिट्टी बह गई और एक कब्र में दफन जनाजा़ बाहर दिखने लगा. इसके बाद लोगों ने कब्रिस्तान कमेटी को इसकी जानकारी दी. कब्रिस्तान कमेटी के सदस्‍यों द्वारा जब कब्र की धंसी हुई मिट्टी को हटाकर देखा गया, तो उसमें दफनाया गया जनाजा ज्यों का त्यों पड़ा मिला.

 

गौरतलब है कि, इस कब्र में 22 वर्ष पहले 55 वर्षीय पेशे से नाई नसीर अहमद नाम के शख्स को दफनाया गया था. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, नसीर अहमद पुत्र अलाउद्दीन निवासी कोर्रही, थाना बिसंडा बबेरू में नाई की दुकान थी. उन्‍हें लगभग 22 वर्ष पहले दफन किया गया था. जबकी दूसरी तरफ मृतक नसीर के एक रिश्तेदार बताते हैं कि उनका कोई बेटा नहीं था. 

 

22 वर्ष पहले उनका निधन हुआ था, जिसके बाद उनलोगों ने ही उनके शव को दफनाया था. लेकिन, आज उनका जनाजा मिटटी धंसने की वजह से बाहर निकल आया. न शव ख़राब हुई थी और न ही कफ़न पर कोई दाग लगा था. हालंकी, बाद में स्थानीय मौलानाओं की मौजूदगी में शव को कल देर रात उसे दूसरी कब्र में दोबारा से दफन किया गया.

 

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