जानें पीएम नेहरू ने इसराइल से क्यों नहीं की दोस्ती


जानें पीएम नेहरू ने इसराइल से क्यों नहीं की दोस्ती

जानें पीएम नेहरू ने इसराइल से क्यों नहीं की दोस्ती, जिसका खामियाजा भारत को उठाना पड़ा।

 

धर्मनिरपेक्ष देश भारत और यहूदी बहल देश इसरायल की आजादी के बीच महज 270 दिनों का फर्क है। जहां, भारत 15 अगस्त, 1947 को तो इसरायल 14 मई, 1948 को आजाद हुआ है। हालाँकि, जब संयक्त राष्ट्र ने इसरायल को राष्ट्र की मान्यता दी तो उस समय अरब देशों ने संयुक्त राष्ट्र में आपत्ति जताई थी। इसके बाबजूद संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका ने इसरायल को आजादी के दिन ही मान्यता दे दी।

 

उस समय भारत और नेहरू ने भी आपत्ति जताई थी कि फलीस्तीन और इसरायल को विभाजित करना उचित नहीं है क्योंकि इससे न केवल एक देश विभित होगा बल्कि दो एक देश दो खेमे में विभाजित हो जाएगा। इसके साथ ही जो भारत और पाकिस्तान की आजादी के बाद हुआ। कुछ ऐसा ही मंजर फलीस्तीन और इसरायल के बंटवारे के बाद होगा।

 

 

इसके बाबजूद संयुक्त राष्ट्र में इसरायल को मान्यता देने के लिए प्रस्ताव पेश किया गया और इस प्रस्ताव को दो तिहाई वोट मिला था। जिसमें अमेरिका और ब्रिटेन से सबसे पहले समर्थन में वोट किया था। इस प्रस्ताव के पास होने के दो साल बाद भारत ने इसराइल की आज़ादी को मान्यता दे दी। इस बारे में तत्कालीन पीएम नेहरू ने कहा था कि भारत इसराइल की आज़ादी के खिलाफ नहीं था बल्कि आज़ादी के पश्चात होने वाले त्रासदी के खिलाफ था।

 

वहीं, ऐसा कहा जाता है कि महान वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने पत्र लिखकर नेहरू को अनुरोध किया था कि भारत इसराइल की आज़ादी में वोट करें, लेकिन नेहरू ने आइन्स्टीन के अनुरोध को ठुकरा दिया था। इसके बाद भारत और इसराइल के आपसी संबंध में खटास आ गया था। जो 1993 तक रहा था। इसके बाद भारत ने 1993 में इसराइल के साथ संबंध स्थापित किया और महज 25 साल में भारत और इसराइल के बीच आपसी संबंध इतनी मजबूत हो गयी कि आज भारत रक्षा सौदे सबसे अधिक इसराइल से करता है।

 

हालांकि, जब इसराइल के साथ भारत ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो उस समय देश की सत्ता गाँधी परिवार के पास नहीं थी। इसलिए इस दोस्ती को नई दिशा और दशा मिली। वैसे इसराइल आज भी भारत के दोहरी राजनीति को भुला नहीं पाया है।

 

 

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बेबाक पत्रकार रवीश कुमार को मिला ‘रैमॉन मैगसेसे’ पुरस्कार


बेबाक पत्रकार रवीश कुमार को मिला ‘रैमॉन मैगसेसे’ पुरस्कार

हिंदी पत्रकारिता जगत में अपनी अलग पहचान बना चुके NDTV के रवीश कुमार को बेस्ट अवार्ड से सम्मानित किया गया है. ये अवार्ड 2019 के ‘रैमॉन मैगसेसे’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इस अवार्ड को ‘रैमॉन मैगसेसे’ को एशिया का नोबेल पुरस्कार के नाम से जाना जाता है. यह पुरस्कार फिलीपीन्स के भूतपूर्व राष्ट्रपति रैमॉन मैगसेसे की याद में दिया जाता है.

आपको बता दें कि, सम्मान के लिए पुरस्कार संस्था ने ट्वीट कर बताया कि रवीश कुमार को यह सम्मान “बेआवाजों की आवाज बनने के लिए दिया गया है.” रवीश कुमार का कार्यक्रम ‘प्राइम टाइम’ ‘आम लोगों की वास्तविक, अनकही समस्याओं को उठाता है.” साथ ही प्रशस्ति पत्र में कहा गया की, ‘अगर आप लोगों की अवाज बन गए हैं, तो आप पत्रकार हैं.’ 

आपको बता दें कि, रवीश कुमार ऐसे छठे पत्रकार हैं जिनको यह पुरस्कार मिला है. इससे पहले अमिताभ चौधरी (1961), बीजी वर्गीज (1975), अरुण शौरी (1982), आरके लक्ष्मण (1984), पी. साईंनाथ (2007) को यह सम्मान मिल चुका है.

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28,000 और जवानों को कश्मीर में किया गया तैनात, हाई अलर्ट पर फोर्सेज


28,000 और जवानों को कश्मीर में किया गया तैनात, हाई अलर्ट पर फोर्सेज

हाल ही में जम्मू कश्मीर में 10,000 हजार अतिरिक्त जवानों की तैनाती के एक हफ्ते के भीतर बड़ा कदम उठाते हुए मोदी सरकार ने कश्मीर 28,000 और अतिरिक्त सुरक्षाबलों की तैनाती कर दिया है. इसके साथ ही सरकार ने सेना और वायुसेना को ऑपरेशनल अलर्ट पर रहने को कहा है.

जिसके चलते स्थानीय नागरिकों में पहचल शुरु हो गई है और लोगों ने तेजी से राशन पानी जुटाना शुरु कर दिया है. इस बीच राज्य के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला ने सरकार के इस अप्रत्याशित कदम पर ट्वीट कर कहा कि “ऐसी कौन सी वर्तमान परिस्थिति है जिसके चलते केंद्र सरकार ने सेना और वायुसेना को ऑपरेशनल अलर्ट पर ऱखा हुआ है, निश्चित तौर पर यह मामला 35ए अथवा परिसीमन से जुड़ा नहीं हैं. अगर सच में इस तरह का कोई अलर्ट जारी किया गया है तो यह बिल्कुल अलग चीज है.”

खास बात यह है कि इन सभी सुरक्षाबलों की राज्य के अति संवेदनशील माने जाने वाले इलाकों में भारी मात्रा में तैनाती की गई हैं. इसके अलावा राज्य के सभी जगहों पर अर्धसैनिक बलों ने कब्जा कर लिया है और प्रदेश पुलिस सिर्फ प्रतीकात्मक बन कर रह गई है.

घाटी में इतनी अधिक मात्रा में सुरक्षाबलों की तैनाती को लेकर हमारे सूत्रों का कहना है कि सरकार 370 और 35ए को लेकर कुछ बड़ा करने की तैयारी कर रही है. हालांकि सरकार का कहना है कि सीमापार से आतंकवादी कश्मीर में बड़ा हमला करने की फिराक में हैं जिसके मद्देनजर किया है.

लेकिन राजनीति के जानकारों का मानना है कि सरकार यह सब ध्यान भटकाने के लिए कह रही है जबकि असल में सरकार कुछ अलग और बड़ा करने की तैयारी कर रही है.

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