जानें इजराइल मामले में भारत की दोहरी राजनीति से कौन घाटे में हैं


जानें इजराइल मामले में भारत की दोहरी राजनीति से कौन घाटे में हैं

भारत और इसराइल की आज़ादी में महज एक वर्ष का अंतर है लेकिन समय के साथ  ये अंतर बढ़ता गया। एक समय में इजराइल भारत से मदद की उम्मीद लगाए रहता था, लेकिन आज स्थिति बदल गयी है। अब भारत को इजराइल से अधिक उम्मीद हो गयी है कि वे भारत-पाकिस्तान संबंध और कश्मीर मामले में भारत का समर्थन करेगा। 

 

इसके लिए भारत सरकार ने इजराइल के नक्शेकदम पर चलते हुए कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया। इसके बाद कश्मीर को दो टुकड़ों में बांट दिया ताकि समस्या बड़ी नहीं छोटी हो। इस फैसले से न केवल कश्मीर का विकास होगा, बल्कि कश्मीर में शांति भी स्थापित होगी। वैसे छिटपुट हिंसक और आतंकवादी घटनाएं घट सकती है। इसमें कोई संदेह नहीं हैं लेकिन विचार करने वाली बात यह है कि भारत सरकार ने उन नीतियों को आज़ादी के समय क्यों नहीं अपनाया, जो आज अपना रही है। 

 

 

बात 1948 की है जब भारत ने इजराइल की आज़ादी का विरोध किया था और इजराइल से वर्ष 1993 तक कोई संबंध नहीं जोड़ा। इसके बाद पीएम नरसिम्हा राव ने कांग्रेस की नीति के विपरीत जाकर इजराइल से दोस्ती की और इसके सात साल बाद देश के तत्कालीन उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी प्रमुख रक्षा दलों के साथ इजराइल पहुंचें। जहां विपक्ष ने उनकी यह कहकर आलोचना की कि वे तमाम देश जो इजराइल की नीतियों की निंदा करते थे, वे आज खुद कतार में लगकर इजराइल से मदद की उम्मीद लगाए बैठें हैं। 

 

इजराइल की विपक्षी पार्टी की इस प्रतिक्रिया से साफ़ जाहिर था कि वे भारत की दोहरी नीति को भूले नहीं हैं और भारत से महज पारस्परिक सहयोग ही रखना चाहते हैं। वहीं, जब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जेरुशलम को इजराइल की राजधानी घोषित करने का प्रस्ताव पारित किया तो भारत ने इसके खिलाफ में वोट किया था। 

 

जिससे एक बार फिर से जाहिर हो गया कि भारत, इजराइल से केवल दोस्ताना संबंध रखना चाहता है। इसके कई कारण है जिसमें भारत का सऊदी अरब के साथ पारस्परिक सहयोग बनाये रखना महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में इजराइल ने भी भारत की निति का अनुसरण करना शुरू कर दिया है और अब केवल औपचारिकता निभा रहा है। 

 

 

हालांकि, भारत सरकार ने कश्मीर मामले में इजराइल मॉडल को ही अपनाया हैं। जिससे भारत और इजराइल के संबंध में स्पष्टता नहीं आ पा रही है कि भारत, इजराइल के साथ कैसा संबंध रखना चाहता है।  

 

भारत सरकार के दोहरी निति से कहीं न कहीं दोनों देशों के रिश्ते पर प्रभाव पड़ रहा है। समय रहते इस रिश्ते पर व्यापक विश्लेषण की जरूरत है क्योंकि अगर भारत को महाशक्ति बनना है तो अमेरिका और इजराइल जैसे देशों की निति और उनके साथ अच्छे संबंध स्थापित करने ही होंगे। फ़िलहाल, कोई देरी नहीं हुई है, लेकिन अगर इसमें देरी की गयी तो आने वाले दिनों में भारत के लिए कई समस्याएं दरवाजे पर दस्तक दे सकती है।

 

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