शिक्षक और एक गुरु में अंतर होता है!


शिक्षक और एक गुरु में अंतर होता है!

वो लोग जो कार्यों में समान लगते हैं लेकिन उनके कार्य प्रणाली और उनकी सोच उनमें अंतर करती है जो उनके कार्य करने के तरीके और सोच पर निर्भर करती है. आओ कुछ ऐसे लोगों की कार्य प्रणाली को समझें. जिस तरह एक शिक्षक और एक गुरु में अंतर होता है उसी प्रकार एक शिक्षाविद और टीचर में अंतर् होता है, एक अर्थशाष्त्री और चार्टेड अकाउंटेंट में अंतर् होता है, एक साइंटिस्ट और साइंस के टीचर में क्या होता है।

 

जैसे चार्टेड अकाउंटेंट और किसी भी विषय के टीचर का मतलब होता है की वो एक विशेष पाठ्यक्रम या अर्थ की कर प्रणाली के बारे में आपको बताएगा समझायेगा। लेकिन जब हम शिक्षाविद की बात करतें हैं या वैज्ञानिक की बात करतें हैं तो इसे समझने का दायरा बहुत बड़ा हो जाता है। एजुकेशनिस्ट या शिक्षाबिद का मतलब होता है की सम्बंधित व्यक्ति को किसी भी देश काल परिस्तिथि के हिसाब से उस क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था की वर्तमान हालत का तार्किक बोध हो।

 

या वो यह समझता हो की किसी क्षेत्र विशेष में उसकी आर्थिक सामाजिक और सांस्कृतिक हालातों के अनुसार किस प्रकार का पाठ्यक्रम लागू करना उचित रहेगा। वो किसी भी देश प्रदेश या क्षेत्र के सम्पूर्ण आर्थिक सांस्कृतिक व्यवस्था का रेशनल अध्यन करके वहाँ एक आसानी से समझ आने वाला वैज्ञानिक पाठ्यक्रम लागू करने में सक्षम हो। 

 

Breaking News : चोरी करने के बाद चोरों ने शीशे पर लिखा, 'भाभी जी आप बहुत अच्छी हैं'

 

 

ऐसे व्यक्ति को आप शिक्षाविद कहतें हैं, जो स्पष्ट रूप से किसी अध्यापक के जॉब रोल से आगे एक बिलकुल अलग निपुणता का जॉब है। ठीक ऐसे ही एक अर्थशास्त्री का कार्य होता है, उसका मुख्य कार्य देश समाज राज्य के प्रोडक्शन और पूँजी की उत्पत्ति के संसाधनों को समझ कर पूँजी के द्रवीय रूप के प्रवाह की निरंतरता बनाये रखना होता है। ये सुनिश्चित करना की सम्पूर्ण जनता पूँजी के इस प्रवाह में योगदान दे और अपनी जीविका भी चलाती रहे। 

 

उसी प्रकार एक पुलिस अधिकारी और खुफिया विभाग के अधिकारी में अंतर होता है, एक पुलिस अधिकारी वैज्ञानिक प्रमाणिकता कम और फासीवादी सोच से ज्यादा काम करता है, इसीलिए जिसे वो अपराधी साबित करके कोर्ट-कचहरी के सामने लाता है उन तथ्यों को वकील गलत साबित कर देता है और असली अपराधी या उनके फासीवादी सोच से उत्पन्न अपराधी कोर्ट से रिहा कर दिए जाते हैं,

 

जबकि एक खुफिया विभाग का अधिकारी तब तक अपनी रिपोर्ट सरकार या अपने विभाग में नहीं देता जब तक उसमें प्रमाणिकता का अभाव हो, क्योंकि उसे मालूम होता है इसकी प्रमाणिकता के आधार पर देश ही नहीं विदेशों से रिश्तों पर भी असर पड़ता है और उसकी रिपोर्ट के आधार पर लिये गये फैसले पूरे देश को नहीं अंतराष्ट्रीय स्तर पर भी विचारणीय होते हैं।

 

Hindi Samachar : चेहरे के छिद्रों ओपन पोर को ख़तम करने के रामबाण उपाय।

 

पुलिस अधिकारी को उसकी बातों और घमंडी स्वभाव से उन्हें तुरंत पहचान लिया जाता है, जबकि खुफिया विभाग का अधिकारी पूरी जिंदगी हमारे बीच रहकर भी नहीं पहचाना जा सकता। उसी प्रकार से एक अधिवक्ता और जज में अंतर है जबकि दोनों न्याय व्यवस्था के धोतक है लेकिन एक अधिवक्ता की कार्यपद्धति जिस बहस को मील का पत्थर बनाकर मेज पीटता है उसी बहस का सही सार जज अपने फैसले में सुनाते हैं और कहां कहां कमी रही है उन पर भी प्रकाश डालने का कार्य करते हैं।

 

ठीक इसी प्रकार से एक विभागीय अधिकारी और पेशेवर की कार्य पद्धति में अंतर होता है, पेशेवर हर कार्य के बहुयी आयामों को समझकर कार्य करने की कोशिश करता हैं जबकि अधिकारी अपने निजी ज्ञान के अनुसार कार्य कराने की कोशिश करता हैं जिसमें गलती होना प्रसांगिक है, इसीलिए पेशेवर वहीं इस्तेमाल किये जातें हैं जहां गलती होना स्वाभाविक है अतः सभी अधिकारियों को पेशेवरों की इज्जत करनी चाहिए।

 

दोस्तों ये समझाने से मेरा मानना है कि सरकार को मंत्रीयो को उनके मंत्रालय देते वक्त वेज्ञानिक पद्धति का प्रयोग करके किस मंत्री में किस मंत्रालय का ज्ञान है देना चाहिए, तभी सरकार अपने लक्ष्य में कामयाब होती है।

 

Teacher essay article Hindi News, हिंदी न्यूज़, Latest News in Hindi, Latest Hindi News, Hindi News Headlines, हिन्दी ख़बर, Breaking News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi Newspaper, headlines in hindi, news headlines in hindi, Taja Samachar, Hindi Samachar, education system in India, Teacher essay

और पढ़ें »

खास आपके लिए

Senior Citizen Tiffin Seva

Viral अड्डा

  • news
  • news
  • news
  • news
-

संस्कृत है तो संस्कृति है!


संस्कृत है तो संस्कृति है!

देवनागरी लिपि लिखने तथा संस्कृत बोलने से बच्चों की जिह्वा तथा अंगुलियों का कड़ापन समाप्त हो जाता है और उनमें लचीलापन आ जाता है। यूरोपीय भाषाएं बोलने और लिखने में जिह्वा एवं अंगुलियों के कुछ भाग सक्रिय नहीं होते, जबकि संस्कृत में इन अंगों के अधिक भाग सक्रिय होते हैं।

 

स्पेन के एक छात्र ने वाराणसी में आकर संस्कृत की पढ़ाई की और इसमें पीएचडी करने के बाद अपन देश ही नहीं पूरे स्पेनिश बोले जाने क्षेत्र में संस्कृत का प्रचार प्रसार किया और उसने इसके पहले ही स्पेनिश से संस्कृत, संस्कृत से स्पेनिश का शब्दकोष भी लाया ताकि इस भाषा को आसानी से समझा जा सकता है। वह छात्र स्पेन का भारत में राजदूत भी रहा और अन्य राष्ट्र में कल्चर राजदूत भी रहा। यह सब कहने का मतलब इतना ही है कि आज भी संस्कृत में जो कुछ है शायद किसी और भाषा में उतना नहीं है।

 

संस्कृत : सभी भाषाओं की जननी

 

संस्कृत देव भाषा है। यह सभी भाषाओं की जननी है। विश्व की समस्त भाषाएं इसी के गर्भ से उद्भूत हुई हैं। वेदों की रचना इसी भाषा में होने के कारण इसे वैदिक भाषा भी कहा जाता है। यह भाषा अपनी दिव्य और दैवीय विशेषाओं के कारण आज भी उतनी ही प्रासंगिक एवं जीवंत है।

 

संस्कृत की इस समृद्धि ने पाश्चात्य विद्वानों को अपनी ओर आकर्षित किया। इस भाषा से प्रभावित होकर सर विलियम जोन्स ने 2 फरवरी, 1786 को ऐसियाटिक सोसायटी कोलकाता में कहा था, संस्कृत एक अद्भूत भाषा है। यह ग्रीक से अधिक पूर्ण, लैटिन से अधिक समृद्ध और अन्य किसी भी भाषा से अधिक परिष्कृत है। इसी कारण संस्कृत को सभी भाषाओं की जननी कहते हैं।

 

संस्कृत को प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा के अंतर्गत रखा जाता है और सभी भाषाओं की उत्पत्ति का सूत्रधार इसे माना जाता है। भाषाविद् मानते हैं कि सभी भाषाओं की उत्पत्ति का तार कहीं न कहीं से संस्कृत से जुड़ा हुआ है, क्योंकि वह सबसे पुरानी एवं समृद्ध भाषा है।

 

किसी भी भाषा की विकासयात्रा में उसकी यह विशेषता जुड़ी होती है कि वह भविष्य में विकसित होने की कितनी क्षमता रखती है। जिस भाषा में यह क्षमता विद्यमान होती है, वह दीर्घकाल तक अपना अस्तित्व बनाए रखती है। परंतु भाषा में उपर्युक्त विशेषता नहीं होती है, उसकी विकास यात्रा थम जाती है।

 

संस्कृत भाषा की अनगिनत विशेषताएं:

 

यह सच है कि संस्कृत भाषा आज प्रचलन में नहीं है, परंतु इसमें अनगिनत विशेषताएं मौजूद हैं। इन्हीं विशेषताओं को लेकर कंप्यूटर के क्षेत्र में प्रयोग चल रहा है। कंप्यूटर विशेषज्ञ इस तथ्य से सहमत हैं कि यदि संस्कृत को कंप्यूटर की डिजिटल अंक भाषा में प्रयोग करने की तकनीक खोजी जा सके तो भाषा जगत के साथ कंप्यूटर के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन देखे जा सकते हैं। जिस दिन यह परिकल्पना साकार एवं मूर्तरूप लेगी, एक नए युग का उदय होगा।

 

संस्कृत उदीयमान भविष्य की एक महत्वपूर्ण धरोहर है। अपने देश में संस्कृत वैदिक भाषा बनकर सिमट गई है। इसे विद्धानों एवं विशेषज्ञों की भाषा मानकर इससे परहेज किया जाता है। किसी अन्य भाषा की तुलना में इसे महत्व ही नहीं दिया जाता है,

 

क्योंकि वर्तमान व्यावसायिक युग में उस भाषा को वरीयता एवं प्राथमिकता प्रदान की जाती है, जिसका व्यावसायिक मूल्य सर्वोपरि होता है। कर्मकांड के क्षेत्र में इसे महत्व तो मिला है, परंतु कर्मकांड की वैज्ञानिकता का लोप हो जाने से इसे अंधविश्वास मानकर संतोष कर लिया जाता है, पर इस भाषा के महत्व को समझ कर इसका प्रयोग किया जाए, तो इससे अनगिनत लाभ हो सकते हैं।

 

इसे भी पढ़ें: कंप्यूटर की तरह तेज बनाये अपना दिमाग

 

सेंट जेम्स इंडिपेंडेंट स्कूल, लंदन में संस्कृत की प्रसिद्धी

 

संस्कृत की विशिष्टता को समझकर लंदन की एक पाठशाला ने अपने जूनियर डिविजन में इसकी शिक्षा को अनिवार्य बना दिया है। लंदन में पाठशाला के अधिकारियों की मान्यता है कि संस्कृत का ज्ञान होने से अऩ्य भाषाओं को सीखने एवं संस्कृत का ज्ञान होने से अन्य भाषाओं को सीखने एवं समझने की क्षमता में अभिवृद्धि होती है।

 

इसको सीखने से गणित एवं विज्ञान को हल करने एवं समझने में आसानी होती है। सेंट जेम्स इंडिपेंडेंट स्कूल नामक यह विद्यालय लंदन के कैनिंगस्टर ओलंपिया क्षेत्र की डेसर्स स्ट्रीट में अवस्थित है। पांच से दस वर्ष तक की आयु के इसके अधिकांश छात्र कॉकेशियन हैं। इस विद्यालय की आरंभिक कक्षाओं में संस्कृत अनिवार्य विषय के रूप में सम्मिलित हैं।

 

इस पाठशाला के शिक्षकों ने अनेक शोध परीक्षण करने के पश्चात अपने निष्कर्ष में पाया कि संस्कृत का ज्ञान बच्चों के सर्वागीण विकास में सहायक होता है। संस्कृत जानने वाला छात्र अन्य भाषाओं के साथ ही गणित, विज्ञान एवं कंप्यूटर आदि की शीघ्रता से सीख जाता है।

 

यह निष्कर्ष उस विद्यालय के विगत बारह वर्ष के अनुभव से प्राप्त हुआ है। संस्कृत अपनी विशिष्ट ध्वन्यात्मकता के कारण प्रमस्तिष्कीय (सेरेब्रल) क्षमता में वृद्धि करती है। इससे सीखने की क्षमता, स्मरणशक्ति, निर्णय क्षमता में आश्चर्यजनक अभिवृद्धि होती है।

 

संभवतः यही कारण है कि पहले बच्चों में विद्यारंभ संस्कार कराया जाता था और उसमें मंत्र लेखन के साथ बच्चे को जप करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता था। संस्कृत से छात्रों की गतिदायक कुशलता मोटर स्किल्स भी विकसित होती है। संस्कृति की रक्षा एवं विकास के लिए संस्कृत को महत्व प्रदान करना आवश्यक है। इस विरासत को हमें फिर से शिरोधार्य करना होगा, तभी इसका विकास एवं उत्थान संभव है।

 

 

और पढ़ें »

खास आपके लिए

Senior Citizen Tiffin Seva

Viral अड्डा

  • news
  • news
  • news
  • news
-

क्या भूखमरी का कोई इलाज है


क्या भूखमरी का कोई इलाज है

-चिरंजीत शर्मा , एडवोकेट

विश्व भूखमरी का इंडेक्स विश्व के पटल पर प्रस्तुत किया गया और 119 देशों में भारत को 102 से नवाजा गया, इंडेक्स के अनुसार भारत में आजादी के 74 साल के बाद भी लगभग 31 प्रतिशत जनसंख्या भूखमरी में जीती है, पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल की स्थिति भी भारत से बहुत बेहतर है जबकि सरकार के अनुसार अगर विकास की गंगा कहीं बह रही है तो वह भारत देश ही है। लेकिन वो विकास किस तरह का है मेरी समझ में नहीं आता क्योंकि देश एक घर है और सरकार घर की मुखिया और जब भी कोई भी घर विकास करता है तो सबसे पहले उसके घर के सभी सदस्यों को दो टाइम की रोटी जरुर मिलती है लेकिन जहां 30 प्रतिशत जनता को रोटी ही ना मिले वो देश कितना विकास कर रहा होगा ये सभी को विचार करना चाहिए।और वो भी तब जब जिस देश का संविधान का आधार है कि सबको पेट भर भोजन देने की व्यवस्था सरकार का प्रथम कर्तव्य होगा। और उसके बाद जिस देश के संसद में भोजन उपलब्धता कानून के ऊपर बहस करके कानून पास किया गया हो जिसका मूल उद्देश्य हर नागरिक को भोजन उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी होगी, उसके बाद 119 देशों में भारत का भूखमरी में 102 वां स्थान विश्व के पटल पर हमारा कितना मान बढ़ा रहे हैं। ये विचार करने योग्य है विचार जरूर करें।

 

दोस्तों भारतीय संस्कृति के अनुसार

 

हमे बेजान वस्तुओं के साथ भी इंसानों जैसा ही व्यवहार करना चाहिए,  इससे हमारी सुचिता  प्रतीत होने लगती है। जब कोई बेजान वस्तुओं, मानव,पशु पक्षियों, पेड़-पौधों के साथ  प्रेमपूर्ण होता है, तो इससे अंतस की पवित्रता की पुष्टि होती है, यह हमारे सहज और सरल होने का परिचायक है, इससे मानव होने का प्रबल आभास होता है। मानस की यही अवस्था महानता का प्रतीक है। इसीलिए किसी बेजान वस्तु के साथ ग़लती से भी यदि दुर्व्यवहार हो जाये तो उससे भी माफ़ी माँग ली जानी चाहिए, इससे वह वस्तु तो कुछ न बोल सकेगी, पर हम इंसान है, इसकी पुष्टि आवश्य हो जायेगी, और यही मन की स्थिति एक दिन हमे महान बनाने मे सहायक होगी, इसी से हमारे होने की, हमारे बीईंग की पुष्टि होगी। और जब हमारा बीईंग शुद्ध होगा, पवित्र होगा, तो ही हमारा सत्य से साक्षात्कारः होगा। यही स्थिति आनन्द की स्थिति है, और यही परम स्थिति है। लेकिन शायद आज भारत में इसकी बहुत कमी है तभी तो सरकार के साथ हमें अपने भूखे देश वासी दिखाई नहीं देते और यदि दिखाई देते हैं तो हमारी संवेदनशीलता कहा चली गई है विचार करें।

 

पिछले दिनों हमारे भारतीय मूल के एक अर्थशास्त्री को नोबल से नवाजा गया है और हम और सबसे पहले सरकार ने अपने आपको महान बताते हुए खुद अपनी पीठ थपथपायी भी दूसरी ओर से ख़बर आती है कि हमारे ही देश के एक नागरिक ने अपने बैंक के अव्यवस्थित वितीय प्रबंध के चलते अपनी जान गंवा दी है और तुरंत सरकार के वित्त मंत्री ने सरकार की भूमिका से इनकार कर के तुरंत इस घटना से पल्ला झाड़ लिया है। हमें विचार करना है कि हमें  गर्व करना चाहिए या शर्म विचार जरूर करें। ये तो हम कर ही सकते हैं।

विश्व में भी  विकास करने की हौड लगी है और सभी देश अपनी सुविधानुसार विकास की दौड़ में अग्रसर है। तभी विश्व के सभी पत्रकार विकास का लेख लिखने के लिए एक देश से दूसरे देश में भागे फिर रहे हैं,  इसी विकास को देखने एक पत्रकार सिरिया पहुंचा और उस  पत्रकार ने उस सीरियाई लड़की से एक क्लिक के लिए मुस्कुराने के लिए कहा ... वह अपनी आँखों में सभी दर्द के साथ मुस्कुराई। यह तस्वीर एक घृणित और शर्मनाक युद्धरत दुनिया का प्रतीक है जिसमें हम रह रहे हैं  और हम नहीं जानते इससे फायदा किसका होगा, विचार जरूर करें।

और पढ़ें »

खास आपके लिए

Senior Citizen Tiffin Seva

Viral अड्डा

  • news
  • news
  • news
  • news
-

वायरल न्यूज़

×