पलायन की आंच पर जिंदगी धुआं-धुआं


 पलायन की आंच पर जिंदगी धुआं-धुआं

-सुभाष चंद्र 

एक गांव से दूसरे गांव में, गांव से नगर, नगर से नगर। भारत में ‘गांव से शहरों’ की ओर पलायन की प्रवृत्ति कुछ ज्यादा है। एक तरफ जहां शहरी चकाचौंध, भागमभाग की जिंदगी, उद्योगों, कार्यालयों तथा विभिन्न प्रतिष्ठानों में रोजगार के अवसर। वहीं गांव में पाई जाने वाली रोजगार की अनिश्चितता, प्राकृतिक आपदा, स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव ने लोगों को पलायन के लिए प्रेरित किया है।

हमारे कई मनीषियों और विचारकों ने कहा है कि गरीब होना सबसे बडा अभिशाप है। गरीब पलायन करता है और नारकीय जीवन जीता है। यह बात एक बार और सिद्ध हुई है हाल के दिनों में। जब पूरे देश में कोरोना को लेकर लाॅकडाउन की घोषणा होती है, उसी समय गरीब बिना अपने स्वास्थ्य की चिंता किए बिने, भूख के कारण और अनश्चितता के डर से पलायन करने को मजबूर होता है। हैरत की बात तो यह है कि इस बार पलायन गांव से शहरों की ओर नहीं, बल्कि शहरों-महानगरों से गांव की ओर हो रही है।
विश्व निवास और नागरिकता संस्था ‘एलआईओ ग्लोबल’ के मुताबिक बड़ी संख्या में अमीर नागरिकों का अपने मूल देश से किसी अन्य देश में पलायन 21वीं सदी का चलन है। संस्था के मुताबिक, दुनियाभर में धनाढ़्य लोगों का पलायन या दूसरे देश की नागरिकता लेने के पीछे दुनियाभर में कहीं भी निवास करने का अधिकार लेने के लिए हो रहा है। अपने परिवार के बेहतर भविष्य और बच्चों की क्वालिटी शिक्षा के लिए पलायन कर रहे हैं। यही स्थिति हमारे देश के अंदर भी है। गांव और कस्बाई शहरों से लोग जीवनयापन के लिए हिंदुस्तान में पलायन कर रहे हैं। इसमें एक अहम कारण रोजगार की कमी है।
असल में, अचानक लॉक डाउन देश को करना पड़ा है उसके कारण आज देश के अंदर क्या स्थिति हो गई है यह कहने की आवश्यकता नहीं है । हां, लेकिन यदि अभी राजनीतिज्ञों से बात करें तो वह यही कहेंगे कि देश को अभी इसकी जरूरत थी और बहुत ही उपयुक्त समय पर लॉक डाउन करने का फैसला लिया गया । क्या इस बारे में दिहाड़ी मजदूरों की बात सोची नहीं गई जिनका गुजरा ही तब चलता था जब वह दिन भर कमाई करके लौटते थे और शाम में राशन खरीदकर अपने परिवार का भरण पोषण करते थे । आज उनकी क्या स्थिति है यह भी सभी जानते है । प्रधान मंत्री कहते है की दो दिन पहले आपसे कहा था कि हमें कुछ सप्ताह चाहिए, लेकिन तीन दिन बाद ही रेल , रोड और हवाई यात्रा को भी लॉक डाउन करना पड़ा । आज जो परिवार अपने सर पर गट्ठर उठाए और अपने बच्चों को गोद में लेकर हजारों मील की यात्रा पर निकल गए है क्या वह अपना सफर जीवित होते पूरा कर पाएंगे ? कोई यह कहता है कि ऐसा सोचा ही नहीं गया तो इससे बड़ी अदूदर्शिता सरकार के लिए हो है नहीं सकती । आज जहां भी नजर जाती है ऐसे लोगों की लंबी लाइन जा रही होती है जो उत्तर प्रदेश अथवा बिहार की अंतहीन यात्रा पर भूखे प्यासे निकल पड़े हैं ।

अब भी समय है वह इन भूखे प्यासे यात्रियों को जहां तक हो सके उन्हें उनके गंतव्य तक पहुंचाए । उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग ही इनमें अधिक है जो दिल्ली, नोएडा, फरीदाबाद ,गाज़ियाबाद , गुरुग्राम में अपने रोज़गार की तलाश में आए थे और दिहाड़ी मजदूर के रूप में रोज़ अपना घर परिवार का भरण पोषण करते थे । दिल्ली एन सी आर में उद्योग के बंद होने के बाद अब वे लोग कहां रहते लिहाज़ा उन्हें लौटना पड़ा और अब जान जोखिम में डालकर भूखे प्यासे अपने गाव वापस लौट रहे हैं । अब ऐसे यात्रियों के साथ जो और परेशानी आने वाली है वह यह कि यह जब अपने घर पहुंचेंगे तो उन्हें गाव के बाहर ही रोक दिया जा रहा है । अब ऐसे लोग कहां जाएंगे ना उन्हें आगे अपने घर जाने दिया जा रहा है और ना ऐसे लोगों के पीछे कोई खड़ा है जो उन्हें सहारा दे सके । सरकार को निश्चित रूप से इस समस्या पर भी पहले विचार करना चाहिए , लेकिन ऐसा नहीं किया और आज हजारों नहीं लाखों गरीबों की जिंदगी दाव पर लग गई है । इन परेशानियों को कैसे सुलझाया जाय यह एक बड़ा गंभीर मुद्दा बनकर सामने आया है ।
विशेषज्ञों के हवाले से 21 दिन के लॉक डाउन की वजह परिभाषित की जा रही है। जैसे -कोरोना वायरस 14 दिन तक सक्रिय रहता है, मरीज में लक्षण 7 दिन में दिखने लगते हैं। मतलब 14 दिन(7 अप्रैल) तक पता चल जाएगा कौन बीमार है। फिर जो बीमार है वो घर में ही रहा, तो अगले 7 दिन (14 अप्रैल) तक उनके परिवार के लक्षण भी दिख जाएंगे। और इस तरह से इसे काबू में किया जाना आसान होगा।

कुछ लोग घर में बैठकर कई राष्ट्राध्यक्षों का संबोधन सुन रहे हैं। आंक रहे हैं कि अपने मोदी जी की तुलना में बाकियों ने अपने यहां लॉक डाउन लागू करवाने के पीछे क्या दलीलें दी है। इसमें पाकिस्तान के इमरान खान से लेकर सिंगापुर, इंडोनेशिया , जमर्नी,आस्ट्रेलिया आदि के लॉक डाउन की घोषणा पर दिया गया भाषण उपलब्ध है। आप भी सुन सकते हैं। तुलना करते हुए वक्त काट सकते हैं।

खाली बैठे लोग इंटरनेट पर सबसे ज्यादा सर्च महामारियों के इतिहास पर कर रहे हैं। यह देखते हुए पता लगा कि बीते सदी के स्पैनिश फ्लू ने पांच करोड़ आबादी को लील लिया था। तब फ्लू के भयंकर चपेट में सैनिकों की टोलियां और नवजात आए थे। इस बार निशाना बुजुर्गों पर है। तब अलास्का के एक गांव ने लॉक डाउन के आसरे उस भयंकर मंजर से खुद को बचा लिया था। मौजूदा आइसोलेशन की तरकीब वहीं से आई है।

दिल्ली के करीब हूं। इसलिए दिल्ली की बात कर रहा हूं। कनाट प्लेस बने सौ साल हुए। इसे बनाने वाले लुटयंस के देश ब्रिटेन से लेकर नई दिल्ली तक में गहरा सन्नाटा पसरा है। दिल्ली ने जन्म से लेकर आजतक जो नहीं देखा, वह नजर आ रहा है। खौफ का मंजर है। लोगबाग रहमत की भीख मांग रहे। जान बचाने की फिक्र में डूबे हैं। खुद बच जाएं। परिवार बच जाए। समाज बच जाए। दोस्त बच जाएं। प़ड़ोसी बच जाए। देश बच जाए। विश्व बच जाए। बस इसी दुआ डूबे है।
दिल्ली के पड़ोस में वैशाली है। यही हूं। दिल्ली से लगने वाली वैशाली उत्तर प्रदेश की पहली या दूसरी आबाद कॉलोनी है। हालात ने सवाल पैदा किया है। क्यों हम लंबी गुनने बुनने में व्यस्त रहते हैं? सौ साल कुछ नहीं होता।
जेहन में सौ साल पहले हमारे गांव- ननिहाल का कथ्य इतिहास है। पूर्वजों की कथा है। आजादी के लड़ाई की गाथा है। बीते चालीस साल में भागमभाग की कहानी है। इस रफ्तार ने दुनिया को सबसे तेजी से बदला है। संचार पर सवार इंसान ग्लोबल गांव में जीने लगा। नतीजा है कि आज पूरे ग्लोब की आबादी सांसत में फंसी है। ऐसे में अगले सौ साल की दुनिया कैसी होगी? इसका आकंलन आसान नहीं।
इतिहास के पन्ने हैं। सौ साल पुरानी दिल्ली है। पंजाब के इलाके के गांवों को भारत की राजधानी बनाने की शुरुआत हुई। सलाह मोहम्मद बिन तुगलक के किले में राजधानी बसाने की आई। वहां राजधानी कोलकाता से दिल्ली को जोड़ने वाली ट्रंक सुविधा का केंद्र था। उसे डिस्टर्ब करने के बजाए मेव आबादी वाले रायसीना पहाड़ी का चयन हुआ। राजा जार्ज पंचम के संरक्षण में ब्रिटिश भारत ने नई राजधानी बसाने में संसाधनों को झोंक दिया। आर्किटेक्ट लुटियंस ने कमाल किया। नया रेशमी शहर बसा दिया। सच्चाई है कि 1920 में तेजी से बस रही नई दिल्ली के दिल कनाट प्लेस की सड़क पर तब जितने इंसान रहे होंगे, आज सौ साल बाद उससे भी कम दिख रहे हैं। तैयारी 1911 में शुरू हुई. मेव गांव रायसीना पहाड़ी पर वायसराय भवन और उसके आसपास के इलाके शिल्पकार की निगरानी में भव्य बनाने की शुरुआत हुई। धीरे धीरे पूरब के कोलकाता से राजधानी को उठाकर 1931 में उत्तर मध्य भारत में स्थित दिल्ली ले आया गया। पुरानी दिल्ली के पास किग्सवे कैंप बसाया गया। तैयारी शानदार रही। पंद्रह साल बाद पहली परीक्षा हुई उसमें दिल्ली पास हुआ। विभाजन की विभीषिका से गुजरी आबादी को विशाल दिल्ली ने अपने में समाहित कर लिया। बंगाल विभाजन का दंश लेकर 70 के दशक में कोलकाता के बजाय दूर बंगाल के लोग दिल्ली में बस गए. आजादी बाद शहर केंद्रित विकास ने रफ्तार पकड़ा। पंजाब, उत्तराखंड, बिहार और हिंदी पट्टी के राज्यों से विस्थापित आबादी दिल्ली पहुंच गई। यह बड़ी आबादी का डेरा बन गया।
आंतरिक पलायन का दंश झेल रहे हिंदुस्तान के लिए नेपाल भी किसी मुसीबत से कम नहीं है। मधेसी आंदोलन से लड़खड़ाई व्यवस्था में खुद को सुरक्षित रखने के लिए नेपाल के लोग तेजी से भारत का रुख करने लगे हैं। इसमें तराई के साथ-साथ पहाड़ी भी शामिल हैं। नेपाल में छोटे-बड़े मिलाकर कुल 22 हजार उद्योग हैं। इनमें ज्यादातर मधेसी कर्मचारी हैं। आंदोलन के कारण कच्चे माल नहीं पहुंच पा रहा है। इससे उद्योग बंद होने को हैं। ऐसे में वहां काम करने वाले लोगों ने भारत का रुख कर लिया है। भारत आने वाल गोरखपुर, लखनऊ, मुंबई सहित एनसीआर के शहरों का रुख कर रहे हैं। वहां के होटल और रेस्टोरेंटों में रहकर खुद के साथ परिवार को संभाल रहे हैं। मोटे तौर पर एक अनुमान के मुताबिक, भूकंप और आंदोलन से पहले महराजगंज के सोनौली से करीब 100 लोग बसों से दिल्ली और लखनऊ रवाना होते थे। लेकिन अब यह संख्या दो से तीन सौ के करीब पहुंच गई है। ठूठीबारी सीमा पर भी नेपाल के तराई क्षेत्रों से आने वाले लोगों की संख्या प्रतिदिन सौ के करीब है। यही हाल सिद्धार्थनगर के कृष्णानगर और अलिगढ़वा सीमा की है। यहां से नेपाली युवा बढ़नी स्टेशन पहुंचकर दिल्ली का रुख कर रहे हैं। बता दें कि मधेसी आंदोलन का प्रभाव मधेस बहुल 22 जिलों के साथ ही पूरे नेपाल पर पड़ा है। तराई से लेकर पहाड़ तक हाहाकार मचा है। नेपाल की करीब तीन करोड़ आबादी को दैनिक उपयोग की वस्तुओं के लिए मशक्कत करनी पड़ रही है। दाल, चावल, आटा, नमक और खाद्य तेल का संकट ऐसा गहराया है कि कीमत तीन गुने तक पहुंच गई है। पैसे खर्च करने के बाद भी सामान आसानी से नहीं मिल रहा है। रूपन्देही, नवलपरासी, सरलाही, जनकपुर, परसा, बारा, बांके, बरदिया, विराटनगर, सुनसरी, सप्तरी और महोत्तरी जिले के लोगों की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई है। ऐसे में लोगों ने भारत का रुख किया है। नेपाल से पलायन करके नेपाली समुदाय के लोग संख्या एनसीआर, लुधियाना, जालंधर जाने वालों की है।  
बीते शताब्दी के आखिरी पच्चीस साल में विकास की धूम में नई दिल्ली विस्तारित होकर एनसीआर बन गया। दो करोड़ से ज्यादा आबादी को यहां खुशहाली मिली। हम 2019 तक दुनिया में सबसे खुबसूरत व्यवस्था वाले शहर में शुमार रहे। 2020 की शुरुआत में कोरोना के भय के साथ हुई है। पूरे जग में पसरा है। यह भय बहुत कुछ सिखा रहा है। यकीन है, भय जल्द छटेंगा। नया दौर आएगा।

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संस्कृत है तो संस्कृति है!


संस्कृत है तो संस्कृति है!

देवनागरी लिपि लिखने तथा संस्कृत बोलने से बच्चों की जिह्वा तथा अंगुलियों का कड़ापन समाप्त हो जाता है और उनमें लचीलापन आ जाता है। यूरोपीय भाषाएं बोलने और लिखने में जिह्वा एवं अंगुलियों के कुछ भाग सक्रिय नहीं होते, जबकि संस्कृत में इन अंगों के अधिक भाग सक्रिय होते हैं।

 

स्पेन के एक छात्र ने वाराणसी में आकर संस्कृत की पढ़ाई की और इसमें पीएचडी करने के बाद अपन देश ही नहीं पूरे स्पेनिश बोले जाने क्षेत्र में संस्कृत का प्रचार प्रसार किया और उसने इसके पहले ही स्पेनिश से संस्कृत, संस्कृत से स्पेनिश का शब्दकोष भी लाया ताकि इस भाषा को आसानी से समझा जा सकता है। वह छात्र स्पेन का भारत में राजदूत भी रहा और अन्य राष्ट्र में कल्चर राजदूत भी रहा। यह सब कहने का मतलब इतना ही है कि आज भी संस्कृत में जो कुछ है शायद किसी और भाषा में उतना नहीं है।

 

संस्कृत : सभी भाषाओं की जननी

 

संस्कृत देव भाषा है। यह सभी भाषाओं की जननी है। विश्व की समस्त भाषाएं इसी के गर्भ से उद्भूत हुई हैं। वेदों की रचना इसी भाषा में होने के कारण इसे वैदिक भाषा भी कहा जाता है। यह भाषा अपनी दिव्य और दैवीय विशेषाओं के कारण आज भी उतनी ही प्रासंगिक एवं जीवंत है।

 

संस्कृत की इस समृद्धि ने पाश्चात्य विद्वानों को अपनी ओर आकर्षित किया। इस भाषा से प्रभावित होकर सर विलियम जोन्स ने 2 फरवरी, 1786 को ऐसियाटिक सोसायटी कोलकाता में कहा था, संस्कृत एक अद्भूत भाषा है। यह ग्रीक से अधिक पूर्ण, लैटिन से अधिक समृद्ध और अन्य किसी भी भाषा से अधिक परिष्कृत है। इसी कारण संस्कृत को सभी भाषाओं की जननी कहते हैं।

 

संस्कृत को प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा के अंतर्गत रखा जाता है और सभी भाषाओं की उत्पत्ति का सूत्रधार इसे माना जाता है। भाषाविद् मानते हैं कि सभी भाषाओं की उत्पत्ति का तार कहीं न कहीं से संस्कृत से जुड़ा हुआ है, क्योंकि वह सबसे पुरानी एवं समृद्ध भाषा है।

 

किसी भी भाषा की विकासयात्रा में उसकी यह विशेषता जुड़ी होती है कि वह भविष्य में विकसित होने की कितनी क्षमता रखती है। जिस भाषा में यह क्षमता विद्यमान होती है, वह दीर्घकाल तक अपना अस्तित्व बनाए रखती है। परंतु भाषा में उपर्युक्त विशेषता नहीं होती है, उसकी विकास यात्रा थम जाती है।

 

संस्कृत भाषा की अनगिनत विशेषताएं:

 

यह सच है कि संस्कृत भाषा आज प्रचलन में नहीं है, परंतु इसमें अनगिनत विशेषताएं मौजूद हैं। इन्हीं विशेषताओं को लेकर कंप्यूटर के क्षेत्र में प्रयोग चल रहा है। कंप्यूटर विशेषज्ञ इस तथ्य से सहमत हैं कि यदि संस्कृत को कंप्यूटर की डिजिटल अंक भाषा में प्रयोग करने की तकनीक खोजी जा सके तो भाषा जगत के साथ कंप्यूटर के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन देखे जा सकते हैं। जिस दिन यह परिकल्पना साकार एवं मूर्तरूप लेगी, एक नए युग का उदय होगा।

 

संस्कृत उदीयमान भविष्य की एक महत्वपूर्ण धरोहर है। अपने देश में संस्कृत वैदिक भाषा बनकर सिमट गई है। इसे विद्धानों एवं विशेषज्ञों की भाषा मानकर इससे परहेज किया जाता है। किसी अन्य भाषा की तुलना में इसे महत्व ही नहीं दिया जाता है,

 

क्योंकि वर्तमान व्यावसायिक युग में उस भाषा को वरीयता एवं प्राथमिकता प्रदान की जाती है, जिसका व्यावसायिक मूल्य सर्वोपरि होता है। कर्मकांड के क्षेत्र में इसे महत्व तो मिला है, परंतु कर्मकांड की वैज्ञानिकता का लोप हो जाने से इसे अंधविश्वास मानकर संतोष कर लिया जाता है, पर इस भाषा के महत्व को समझ कर इसका प्रयोग किया जाए, तो इससे अनगिनत लाभ हो सकते हैं।

 

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सेंट जेम्स इंडिपेंडेंट स्कूल, लंदन में संस्कृत की प्रसिद्धी

 

संस्कृत की विशिष्टता को समझकर लंदन की एक पाठशाला ने अपने जूनियर डिविजन में इसकी शिक्षा को अनिवार्य बना दिया है। लंदन में पाठशाला के अधिकारियों की मान्यता है कि संस्कृत का ज्ञान होने से अऩ्य भाषाओं को सीखने एवं संस्कृत का ज्ञान होने से अन्य भाषाओं को सीखने एवं समझने की क्षमता में अभिवृद्धि होती है।

 

इसको सीखने से गणित एवं विज्ञान को हल करने एवं समझने में आसानी होती है। सेंट जेम्स इंडिपेंडेंट स्कूल नामक यह विद्यालय लंदन के कैनिंगस्टर ओलंपिया क्षेत्र की डेसर्स स्ट्रीट में अवस्थित है। पांच से दस वर्ष तक की आयु के इसके अधिकांश छात्र कॉकेशियन हैं। इस विद्यालय की आरंभिक कक्षाओं में संस्कृत अनिवार्य विषय के रूप में सम्मिलित हैं।

 

इस पाठशाला के शिक्षकों ने अनेक शोध परीक्षण करने के पश्चात अपने निष्कर्ष में पाया कि संस्कृत का ज्ञान बच्चों के सर्वागीण विकास में सहायक होता है। संस्कृत जानने वाला छात्र अन्य भाषाओं के साथ ही गणित, विज्ञान एवं कंप्यूटर आदि की शीघ्रता से सीख जाता है।

 

यह निष्कर्ष उस विद्यालय के विगत बारह वर्ष के अनुभव से प्राप्त हुआ है। संस्कृत अपनी विशिष्ट ध्वन्यात्मकता के कारण प्रमस्तिष्कीय (सेरेब्रल) क्षमता में वृद्धि करती है। इससे सीखने की क्षमता, स्मरणशक्ति, निर्णय क्षमता में आश्चर्यजनक अभिवृद्धि होती है।

 

संभवतः यही कारण है कि पहले बच्चों में विद्यारंभ संस्कार कराया जाता था और उसमें मंत्र लेखन के साथ बच्चे को जप करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता था। संस्कृत से छात्रों की गतिदायक कुशलता मोटर स्किल्स भी विकसित होती है। संस्कृति की रक्षा एवं विकास के लिए संस्कृत को महत्व प्रदान करना आवश्यक है। इस विरासत को हमें फिर से शिरोधार्य करना होगा, तभी इसका विकास एवं उत्थान संभव है।

 

 

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क्या भूखमरी का कोई इलाज है


क्या भूखमरी का कोई इलाज है

-चिरंजीत शर्मा , एडवोकेट

विश्व भूखमरी का इंडेक्स विश्व के पटल पर प्रस्तुत किया गया और 119 देशों में भारत को 102 से नवाजा गया, इंडेक्स के अनुसार भारत में आजादी के 74 साल के बाद भी लगभग 31 प्रतिशत जनसंख्या भूखमरी में जीती है, पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल की स्थिति भी भारत से बहुत बेहतर है जबकि सरकार के अनुसार अगर विकास की गंगा कहीं बह रही है तो वह भारत देश ही है। लेकिन वो विकास किस तरह का है मेरी समझ में नहीं आता क्योंकि देश एक घर है और सरकार घर की मुखिया और जब भी कोई भी घर विकास करता है तो सबसे पहले उसके घर के सभी सदस्यों को दो टाइम की रोटी जरुर मिलती है लेकिन जहां 30 प्रतिशत जनता को रोटी ही ना मिले वो देश कितना विकास कर रहा होगा ये सभी को विचार करना चाहिए।और वो भी तब जब जिस देश का संविधान का आधार है कि सबको पेट भर भोजन देने की व्यवस्था सरकार का प्रथम कर्तव्य होगा। और उसके बाद जिस देश के संसद में भोजन उपलब्धता कानून के ऊपर बहस करके कानून पास किया गया हो जिसका मूल उद्देश्य हर नागरिक को भोजन उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी होगी, उसके बाद 119 देशों में भारत का भूखमरी में 102 वां स्थान विश्व के पटल पर हमारा कितना मान बढ़ा रहे हैं। ये विचार करने योग्य है विचार जरूर करें।

 

दोस्तों भारतीय संस्कृति के अनुसार

 

हमे बेजान वस्तुओं के साथ भी इंसानों जैसा ही व्यवहार करना चाहिए,  इससे हमारी सुचिता  प्रतीत होने लगती है। जब कोई बेजान वस्तुओं, मानव,पशु पक्षियों, पेड़-पौधों के साथ  प्रेमपूर्ण होता है, तो इससे अंतस की पवित्रता की पुष्टि होती है, यह हमारे सहज और सरल होने का परिचायक है, इससे मानव होने का प्रबल आभास होता है। मानस की यही अवस्था महानता का प्रतीक है। इसीलिए किसी बेजान वस्तु के साथ ग़लती से भी यदि दुर्व्यवहार हो जाये तो उससे भी माफ़ी माँग ली जानी चाहिए, इससे वह वस्तु तो कुछ न बोल सकेगी, पर हम इंसान है, इसकी पुष्टि आवश्य हो जायेगी, और यही मन की स्थिति एक दिन हमे महान बनाने मे सहायक होगी, इसी से हमारे होने की, हमारे बीईंग की पुष्टि होगी। और जब हमारा बीईंग शुद्ध होगा, पवित्र होगा, तो ही हमारा सत्य से साक्षात्कारः होगा। यही स्थिति आनन्द की स्थिति है, और यही परम स्थिति है। लेकिन शायद आज भारत में इसकी बहुत कमी है तभी तो सरकार के साथ हमें अपने भूखे देश वासी दिखाई नहीं देते और यदि दिखाई देते हैं तो हमारी संवेदनशीलता कहा चली गई है विचार करें।

 

पिछले दिनों हमारे भारतीय मूल के एक अर्थशास्त्री को नोबल से नवाजा गया है और हम और सबसे पहले सरकार ने अपने आपको महान बताते हुए खुद अपनी पीठ थपथपायी भी दूसरी ओर से ख़बर आती है कि हमारे ही देश के एक नागरिक ने अपने बैंक के अव्यवस्थित वितीय प्रबंध के चलते अपनी जान गंवा दी है और तुरंत सरकार के वित्त मंत्री ने सरकार की भूमिका से इनकार कर के तुरंत इस घटना से पल्ला झाड़ लिया है। हमें विचार करना है कि हमें  गर्व करना चाहिए या शर्म विचार जरूर करें। ये तो हम कर ही सकते हैं।

विश्व में भी  विकास करने की हौड लगी है और सभी देश अपनी सुविधानुसार विकास की दौड़ में अग्रसर है। तभी विश्व के सभी पत्रकार विकास का लेख लिखने के लिए एक देश से दूसरे देश में भागे फिर रहे हैं,  इसी विकास को देखने एक पत्रकार सिरिया पहुंचा और उस  पत्रकार ने उस सीरियाई लड़की से एक क्लिक के लिए मुस्कुराने के लिए कहा ... वह अपनी आँखों में सभी दर्द के साथ मुस्कुराई। यह तस्वीर एक घृणित और शर्मनाक युद्धरत दुनिया का प्रतीक है जिसमें हम रह रहे हैं  और हम नहीं जानते इससे फायदा किसका होगा, विचार जरूर करें।

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