जानें दोहरी राजनीति के कद्दावर नेता राम विलास पासवान की जीवनी


जानें दोहरी राजनीति के कद्दावर नेता राम विलास पासवान की जीवनी

दोहरी राजनीति के पक्षधर रहने वाले राम विलास पासवान बिहार के कद्दावर नेता के साथ साथ मोदी सरकार के पहले और दूसरे कार्यकाल में खाद्य वितरण मंत्री रहे है। फ़िलहाल इन्होंने अपने बेटे चिराग पासवान को अपना उत्तराधिकारी बनाया है जो पहले बॉलीवुड की दुनिया में अपनी किस्मत आजमा रहे थे। राम विलास पासवान अपने जीवन में दोहरी राजनीति के लिए सबसे अधिक जाने जाते हैं। आइये राम विलास पासवान की जीवनी जानते हैं।

 

राम विलास पासवान का जन्म 5 जुलाई 1946 को बिहार के खगरिया जिले के शाहरबन्नी गांव में अनुसूचित जाति परिवार में हुआ हैं। इनकी पहली शादी 1960 में राजकुमारी देवी से शादी हुई थी लेकिन राजकुमारी देवी को उन्होंने 1981 में तलाक दे दिया। इस घर से उनको उषा और आशा दो बेटियां हैं और फिर दो साल बाद 1983 में उन्होंने एक एयरहोस्टेस पंजाबी हिंदू लड़की रीना शर्मा से शादी की। जिसके उपरांत उन्हें एक बेटा और बेटी हुआ।

 

इसी घर से उनके घर में पुत्र की प्राप्ति हुई और ये पुत्र चिराग पासवान हैं। जो अभिनेता से राजनेता बने हैं। इस बात की पुष्टि उन्होंने स्वंय 2014 में लोकसभा चुनाव में नामांकन के दौरान की थी। इन्होंने पटना और कोशी यूनिवर्सिटी से स्नातक की है। पासवान की राजनैतिक करियर की शुरुआत 1969 में हुई जब वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी की तरफ से रिजर्व सीट से विधायक बने और फिर 1974 में लोक दल के जनरल सेक्रेटरी बने।

 

 

इस समय वे कर्पूरी ठाकुर, सत्येंद्र नारायण और राज नारायण के सम्पर्क में आये और इसके बाद मोरारजी देसाई के सम्पर्क में आकर जनता पार्टी ज्वाइन की और इसी से फिर लोकबंधु पार्टी के प्रेजिडेंट और चेयरमैन बने। जब 1945 में एमरजेंसी लगी तो उन्होंने इसका विरोध किया और पकड़े गए। इसके बाद लगातार दो साल तक पासवान जेल में रहे और फिर 1977 में जेल से रिहा किये गये। इसके बाद उन्हें जनता दल से सांसद सीट की टिकट हाजीपुर से मिली। इस चुनाव में वे भारी मतों से विजयी हुये।

 

इस सीट पर वे लगातार 1980 और 1998 में जीत दर्ज की। पासवान की पकड़ हाजीपुर में बढ़ती गयी और नौ वीं लोकसभा चुनाव 1989 में पुनः जीत दर्ज की और विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में लेबर एंड वेलफेर मिनिस्टर बनाये गए। इसके बाद 1996 में वे राज्य सभा सदस्य से थे उस समय वे रेल मंत्री बनाये गए और इस पद पर 1998 तक रहे। इसके बाद 1999 में उन्हें कोयला मंत्री बबनाया गया और इस पद पर वह अप्रैल 2002 तक आसीन रहे।

 

 

पासवान 2000 में जनता दल से अलग हो गए और खुद की लोक जनशक्ति पार्टी बनाई और 2004 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने यूपीए से हाथ मिला लिया। इस चुनाव में कांग्रेस अलायंस को स्पष्ट बहुमत मिला। इस सरकार में पासवान केमिकल और फर्टिलाइजर्स मिनिस्टर बनाये गए। इसके बाद 2009 में पासवान यूपीए से अलग होकर मुलायम सिंह और लालू यादव से हाथ मिलाकर चौथे फ्रंट की निर्माण की लेकिन इस चुनाव में उनका जादू नहीं चल पाया और जनता दल के राम सुन्दर दास से पराजित हो गए। इसके बाद 2014 में उन्होंने बीजेपी के साथ अलायंस किया और इस चुनाव में वे विजयी प्राप्त की।

 

इस जीत के बाद पीएम मोदी ने उन्हें कैबिनेट में जगह दी और खाद्य एवं वितरण मंत्री बनाये गए। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में भी उन्होंने हाजीपुर से जीत हासिल की और पुनः खाद्य एवं वितरण की जिम्मेवारी संभाली। हालांकि, पासवान बिहार के कद्दावर नेता में से एक है लेकिन बिहार की जनता को इनकी छवि और राजनीति से अधिक उम्मीद है और ये उम्मीद बिहार को विकसित राज्य बनाने की है।

 

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बेबाक पत्रकार रवीश कुमार को मिला ‘रैमॉन मैगसेसे’ पुरस्कार


बेबाक पत्रकार रवीश कुमार को मिला ‘रैमॉन मैगसेसे’ पुरस्कार

हिंदी पत्रकारिता जगत में अपनी अलग पहचान बना चुके NDTV के रवीश कुमार को बेस्ट अवार्ड से सम्मानित किया गया है. ये अवार्ड 2019 के ‘रैमॉन मैगसेसे’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इस अवार्ड को ‘रैमॉन मैगसेसे’ को एशिया का नोबेल पुरस्कार के नाम से जाना जाता है. यह पुरस्कार फिलीपीन्स के भूतपूर्व राष्ट्रपति रैमॉन मैगसेसे की याद में दिया जाता है.

आपको बता दें कि, सम्मान के लिए पुरस्कार संस्था ने ट्वीट कर बताया कि रवीश कुमार को यह सम्मान “बेआवाजों की आवाज बनने के लिए दिया गया है.” रवीश कुमार का कार्यक्रम ‘प्राइम टाइम’ ‘आम लोगों की वास्तविक, अनकही समस्याओं को उठाता है.” साथ ही प्रशस्ति पत्र में कहा गया की, ‘अगर आप लोगों की अवाज बन गए हैं, तो आप पत्रकार हैं.’ 

आपको बता दें कि, रवीश कुमार ऐसे छठे पत्रकार हैं जिनको यह पुरस्कार मिला है. इससे पहले अमिताभ चौधरी (1961), बीजी वर्गीज (1975), अरुण शौरी (1982), आरके लक्ष्मण (1984), पी. साईंनाथ (2007) को यह सम्मान मिल चुका है.

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28,000 और जवानों को कश्मीर में किया गया तैनात, हाई अलर्ट पर फोर्सेज


28,000 और जवानों को कश्मीर में किया गया तैनात, हाई अलर्ट पर फोर्सेज

हाल ही में जम्मू कश्मीर में 10,000 हजार अतिरिक्त जवानों की तैनाती के एक हफ्ते के भीतर बड़ा कदम उठाते हुए मोदी सरकार ने कश्मीर 28,000 और अतिरिक्त सुरक्षाबलों की तैनाती कर दिया है. इसके साथ ही सरकार ने सेना और वायुसेना को ऑपरेशनल अलर्ट पर रहने को कहा है.

जिसके चलते स्थानीय नागरिकों में पहचल शुरु हो गई है और लोगों ने तेजी से राशन पानी जुटाना शुरु कर दिया है. इस बीच राज्य के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला ने सरकार के इस अप्रत्याशित कदम पर ट्वीट कर कहा कि “ऐसी कौन सी वर्तमान परिस्थिति है जिसके चलते केंद्र सरकार ने सेना और वायुसेना को ऑपरेशनल अलर्ट पर ऱखा हुआ है, निश्चित तौर पर यह मामला 35ए अथवा परिसीमन से जुड़ा नहीं हैं. अगर सच में इस तरह का कोई अलर्ट जारी किया गया है तो यह बिल्कुल अलग चीज है.”

खास बात यह है कि इन सभी सुरक्षाबलों की राज्य के अति संवेदनशील माने जाने वाले इलाकों में भारी मात्रा में तैनाती की गई हैं. इसके अलावा राज्य के सभी जगहों पर अर्धसैनिक बलों ने कब्जा कर लिया है और प्रदेश पुलिस सिर्फ प्रतीकात्मक बन कर रह गई है.

घाटी में इतनी अधिक मात्रा में सुरक्षाबलों की तैनाती को लेकर हमारे सूत्रों का कहना है कि सरकार 370 और 35ए को लेकर कुछ बड़ा करने की तैयारी कर रही है. हालांकि सरकार का कहना है कि सीमापार से आतंकवादी कश्मीर में बड़ा हमला करने की फिराक में हैं जिसके मद्देनजर किया है.

लेकिन राजनीति के जानकारों का मानना है कि सरकार यह सब ध्यान भटकाने के लिए कह रही है जबकि असल में सरकार कुछ अलग और बड़ा करने की तैयारी कर रही है.

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