जानें अपने विवादित बयान के लिए मशहूर राजनेता और गुना के राजकुमार दिग्विजय सिंह की जीवनी


जानें अपने विवादित बयान के लिए मशहूर राजनेता और गुना के राजकुमार दिग्विजय सिंह की जीवनी

अपने विवादित बोल और आरएसएस के साथ साथ छात्र इस्लामिक मूवमेंट को ‘नज़ीस’ कहने वाले दिग्विजय सिंह कांग्रेस के दिग्गज नेता है। उन्होंने एक बार विजयराज सिंधिया के आरएसएस ज्वाइन करने के प्रस्ताव को यह कहकर ठुकरा दिया था कि आरएसएस राष्ट्रिय एकता के लिए खतरा है। आज हम आपको दिग्विजय सिंह की जीवनी बताने जा रहे हैं। आइये जानते हैं।

 

दिग्विजय सिंह का जन्म 28 फरवरी, 1947 को इंदौर, मध्यप्रदेश में हुआ था। इनके पिता बालभद्र सिंह गुना जिले के (कालांतर में राघोगढ़) के राजा थे और माता स्वर्गीय श्रीमती अपर्णा कुमारी एक कुशल गृहणी थीं। इनका बड़ा भाई लक्ष्मण सिंह है और पत्नियों का नाम स्वर्गीय श्रीमती राणा आशा कुमारी एवं अमृता राय है।

 

परिवार में एक बेटे जयवर्धन सिंह और तीन बेटियां मंदाकिनी कुमारी, कर्निका कुमारी एवं म्रदीमा कुमारी हैं। दिग्विजय सिंह अपनी प्रारंभिक पढ़ाई  इंदौर के डेली कॉलेज से पूरी की। इसके बाद उच्च शिक्षा इंदौर के श्री गोविन्द्रम सेकसरिया इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एवं साइंस से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में पूरी की।

 

 

राजनीतिक करियर :

दिग्विजय सिंह ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत सन 1970 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी से की। इनके पिता जी भारतीय जनसंघ पार्टी से संबंध रखते थे लेकिन दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस को अपनी पार्टी चुनी। उन्होंने आपातकाल में कांग्रेस का मोर्चा संभाला और उनके कुशल नेतृत्व और क्षमता के आधार पर कांग्रेस ने उन्हें 1977 में मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव से टिकट दिया। इस चुनाव में उनकी जीत हुई। इसके बाद 1980 में मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों में गुना जिले से फिर निर्वाचित हुए। इस समय उन्हें कैबिनेट मंत्री के रूप में कृषि, पशुपालन एवं मत्स्य पालन, सिंचाई की जिम्मेवारी दी गयी। जिसे उन्होंने बखूबी पूरा किया।

 

इसके बाद 1984 में लोक सभा चुनाव के लिए मध्यप्रदेश की कांग्रेस कमिटी का अध्यक्ष नियुक्त किया और इस पद पर वे 1988 तक रहे। इसके एक साल बाद उन्हें इस जिम्मेवारी से हटा दिया लेकिन 1991 में उन्हें फिर से इसकी जिम्मेवारी दी गयी। इस बार उन्होंने कुशलता पूर्वक अपनी जिम्मेवारी को निभाया और सन 1993 में वे गुना से फिर से चुने गए और इस बार जीत के साथ ही प्रदेश के सीएम भी बने। अपने पहले कार्यकाल को दिग्वजय सिंह ने सफलतापूर्वक पूरा किया और अगल विधान सभा चुनाव में न केवल स्वंय जीते बल्कि पार्टी को भी फिर से बहुमत मिली। इस जीत के बाद उन्हें दोबारा सीएम बनाया गया।

 

 

इस पद पर वे सन 2003 तक कार्य किया लेकिन 2003 विधान सभा चुनाव में उनकी पार्टी को करारी हार मिली और इस हार की जिम्मेवारी लेते हुए दिग्विजय सिंह ने 10 वर्षों तक कोई भी चुनाव नहीं लड़ा। इसके बाद सन 2013 में इन्हें आल इंडिया कांग्रेस कमेटी का महासचिव  नियुक्त किया गया और इस पद के रूप में वे ओडिशा, बिहार, उत्तरप्रदेश, असम, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और गोवा राज्यों के कांग्रेस कमान को संभाला।

 

इसके बाद मोदी लहर में कांग्रेस की करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। जिसके बाद मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव में भी उन्हें पार्टी की तरह से कोई महत्वपूर्ण पद नहीं दिया गया। हालांकि, इस चुनाव में कांग्रेस की सरकार बनी लेकिन दिग्विजय सिंह को राजनीति से दूर रखा गया। जिससे साफ़ जाहिर है कि कांग्रेस दिग्विजय सिंह को आगे कोई जिम्मेदारी नहीं देना चाहती है। ऐसे में दिग्विजय सिंह की राजनीति अब सन्यास की और अग्रसर है।

 

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बेबाक पत्रकार रवीश कुमार को मिला ‘रैमॉन मैगसेसे’ पुरस्कार


बेबाक पत्रकार रवीश कुमार को मिला ‘रैमॉन मैगसेसे’ पुरस्कार

हिंदी पत्रकारिता जगत में अपनी अलग पहचान बना चुके NDTV के रवीश कुमार को बेस्ट अवार्ड से सम्मानित किया गया है. ये अवार्ड 2019 के ‘रैमॉन मैगसेसे’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इस अवार्ड को ‘रैमॉन मैगसेसे’ को एशिया का नोबेल पुरस्कार के नाम से जाना जाता है. यह पुरस्कार फिलीपीन्स के भूतपूर्व राष्ट्रपति रैमॉन मैगसेसे की याद में दिया जाता है.

आपको बता दें कि, सम्मान के लिए पुरस्कार संस्था ने ट्वीट कर बताया कि रवीश कुमार को यह सम्मान “बेआवाजों की आवाज बनने के लिए दिया गया है.” रवीश कुमार का कार्यक्रम ‘प्राइम टाइम’ ‘आम लोगों की वास्तविक, अनकही समस्याओं को उठाता है.” साथ ही प्रशस्ति पत्र में कहा गया की, ‘अगर आप लोगों की अवाज बन गए हैं, तो आप पत्रकार हैं.’ 

आपको बता दें कि, रवीश कुमार ऐसे छठे पत्रकार हैं जिनको यह पुरस्कार मिला है. इससे पहले अमिताभ चौधरी (1961), बीजी वर्गीज (1975), अरुण शौरी (1982), आरके लक्ष्मण (1984), पी. साईंनाथ (2007) को यह सम्मान मिल चुका है.

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28,000 और जवानों को कश्मीर में किया गया तैनात, हाई अलर्ट पर फोर्सेज


28,000 और जवानों को कश्मीर में किया गया तैनात, हाई अलर्ट पर फोर्सेज

हाल ही में जम्मू कश्मीर में 10,000 हजार अतिरिक्त जवानों की तैनाती के एक हफ्ते के भीतर बड़ा कदम उठाते हुए मोदी सरकार ने कश्मीर 28,000 और अतिरिक्त सुरक्षाबलों की तैनाती कर दिया है. इसके साथ ही सरकार ने सेना और वायुसेना को ऑपरेशनल अलर्ट पर रहने को कहा है.

जिसके चलते स्थानीय नागरिकों में पहचल शुरु हो गई है और लोगों ने तेजी से राशन पानी जुटाना शुरु कर दिया है. इस बीच राज्य के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला ने सरकार के इस अप्रत्याशित कदम पर ट्वीट कर कहा कि “ऐसी कौन सी वर्तमान परिस्थिति है जिसके चलते केंद्र सरकार ने सेना और वायुसेना को ऑपरेशनल अलर्ट पर ऱखा हुआ है, निश्चित तौर पर यह मामला 35ए अथवा परिसीमन से जुड़ा नहीं हैं. अगर सच में इस तरह का कोई अलर्ट जारी किया गया है तो यह बिल्कुल अलग चीज है.”

खास बात यह है कि इन सभी सुरक्षाबलों की राज्य के अति संवेदनशील माने जाने वाले इलाकों में भारी मात्रा में तैनाती की गई हैं. इसके अलावा राज्य के सभी जगहों पर अर्धसैनिक बलों ने कब्जा कर लिया है और प्रदेश पुलिस सिर्फ प्रतीकात्मक बन कर रह गई है.

घाटी में इतनी अधिक मात्रा में सुरक्षाबलों की तैनाती को लेकर हमारे सूत्रों का कहना है कि सरकार 370 और 35ए को लेकर कुछ बड़ा करने की तैयारी कर रही है. हालांकि सरकार का कहना है कि सीमापार से आतंकवादी कश्मीर में बड़ा हमला करने की फिराक में हैं जिसके मद्देनजर किया है.

लेकिन राजनीति के जानकारों का मानना है कि सरकार यह सब ध्यान भटकाने के लिए कह रही है जबकि असल में सरकार कुछ अलग और बड़ा करने की तैयारी कर रही है.

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