लॉक डाउन : अब नहीं आएंगें भैइये


-मुस्तकीम अंसारी

 

लॉकडाउन के समय ही देश के कई राज्यों से दिहाड़ी प्रवासी मजदूर अपने घरों को लौट गए हैं या जो बचे हैं वे किसी तरह अपने घर जाने को बेताब हैं. अपनों के बीच ही रहना चाहते हैं. ये मजदूर पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली समेत तमाम राज्यों में मजदूरी करके किसी तरह अपना जीवनयापन करते थे. मगर इन मजदूरों के घर लौट जाने से राज्यों को बहुत अधिक चिंता सता रही है.

 

दरअसल, खेती किसानी, निर्माण कार्य और भी कई कामों के लिए कई राज्य इन प्रवासी दिहाड़ी मजदूरों पर अधिक निर्भर रहते हैं और अब उनके लौट जाने के बाद इन लोगों के सामने एक गंभीर समस्या खड़ी हो गई है. इन राज्यों के मुख्यमंत्री अब उन मजदूरों को वापस लाने का प्रयास कर रहे हैं, जो या तो अन्य राज्यों जैसे कि बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और ओडिशा में अपने घरों को लौट गए हैं या फंसे हुए हैं.

 

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से अनुरोध किया है कि वो बिहार के मजदूरों को उनके प्रदेश भेज दें. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि जो प्रवासी मजदूर पंजाब में हैं उन्हें वापस रहना चाहिए और राज्य सरकार उनकी देखभाल करेगी.

 

तो वहीं पंजाब के वित्त मंत्री मनप्रीत बादल ने बताया है कि, "हमें वर्तमान गेहूं की फसल में कोई समस्या नहीं है, लेकिन मेरी चिंता आगामी धान की फसल है, जो पूरी तरह से प्रवासी श्रमिक बल पर निर्भर है." "जो लोग यहाँ पंजाब में हैं, किसी को भी किसी समस्या या भूख का सामना नहीं करना पड़ेगा क्योंकि यह सबको खिलाना हमारी संस्कृति का हिस्सा है." बादल ने स्वीकार किया कि पंजाब में कृषि और उद्योग प्रवासी मजदूरों पर बहुत निर्भर करता है.

 

इसके अलावा तेलंगाना के मुख्य सचिव, सोमेश कुमार ने बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी से बात की, उनसे अनुरोध किया कि वे राज्य की चावल मिलों में काम करने के लिए मजदूरों को वापस लौटने के लिए कहें. यहां तक कि उन्होंने उन्हें बस से तेलंगाना लाने की पेशकश की और वादा किया कि उनकी हर चीज का ध्यान रखा जाएगा.

 

इससे पहले तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव प्रेस वार्ता में कहा था कि, तेलंगाना की चावल मिलों में 95% श्रमिक बिहार से हैं. इन मजदूरों की अनुपस्थिति तेलंगाना के लिए मुश्किल खड़ी करेगी जिसका उद्देश्य इस बार किसानों से रिकॉर्ड धान की खरीद करना है.

 

इसपर बिहार के उपमुख्यमंत्री मोदी ने बताया कि, 'मुझे राजस्थान के उद्योगपतियों से भी फोन आ रहे हैं, जो राज्य में फंसे बिहारी कामगारों की मदद करने की कोशिश कर रहे हैं.' "उनकी चिंता यह है कि एक बार लॉकडाउन के बाद ये श्रमिक बिहार चले जाते हैं, तो वे कम से कम छह महीने तक उद्योग शुरू नहीं कर पाएंगे."

 

दरअसल देश के जितने भी छोटे-बड़े कारखने है यह सब UP, बिहार के दिहाड़ी मजदूरों के कंधों पर टिका है। लेकिन अब भैइये लौटने को तैयार नहीं हैं. क्योंकि जब वे प्रवासी मजदूर वहां रहते हैं तो उनकी देखभाल नहीं की जाती है और उन्हें भैइये कहकर नीचा भी दिखाया जाता है। वहीं बिहार और उत्तर प्रदेश में कई ऐसे रोजगार के साधन उपलब्ध हो गए हैं जहां वे जीवनयापन कर सकते हैं।

 

केंद्र सरकार भी लगातार प्रदेशों में चल रही योजनाओं के लिए विशेष योगदान देने की घोषणा की है। ऐसे में दिहाड़ी मजदूर अब अपने राज्यों से जाने को तैयार नहीं। अब भैइये पर निर्भर उद्योग और कृषि कार्य कैसे हो राज्य सोचने को मजबूर हैं।

 

 

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बेबाक पत्रकार रवीश कुमार को मिला ‘रैमॉन मैगसेसे’ पुरस्कार


बेबाक पत्रकार रवीश कुमार को मिला ‘रैमॉन मैगसेसे’ पुरस्कार

हिंदी पत्रकारिता जगत में अपनी अलग पहचान बना चुके NDTV के रवीश कुमार को बेस्ट अवार्ड से सम्मानित किया गया है. ये अवार्ड 2019 के ‘रैमॉन मैगसेसे’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इस अवार्ड को ‘रैमॉन मैगसेसे’ को एशिया का नोबेल पुरस्कार के नाम से जाना जाता है. यह पुरस्कार फिलीपीन्स के भूतपूर्व राष्ट्रपति रैमॉन मैगसेसे की याद में दिया जाता है.

आपको बता दें कि, सम्मान के लिए पुरस्कार संस्था ने ट्वीट कर बताया कि रवीश कुमार को यह सम्मान “बेआवाजों की आवाज बनने के लिए दिया गया है.” रवीश कुमार का कार्यक्रम ‘प्राइम टाइम’ ‘आम लोगों की वास्तविक, अनकही समस्याओं को उठाता है.” साथ ही प्रशस्ति पत्र में कहा गया की, ‘अगर आप लोगों की अवाज बन गए हैं, तो आप पत्रकार हैं.’ 

आपको बता दें कि, रवीश कुमार ऐसे छठे पत्रकार हैं जिनको यह पुरस्कार मिला है. इससे पहले अमिताभ चौधरी (1961), बीजी वर्गीज (1975), अरुण शौरी (1982), आरके लक्ष्मण (1984), पी. साईंनाथ (2007) को यह सम्मान मिल चुका है.

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28,000 और जवानों को कश्मीर में किया गया तैनात, हाई अलर्ट पर फोर्सेज


28,000 और जवानों को कश्मीर में किया गया तैनात, हाई अलर्ट पर फोर्सेज

हाल ही में जम्मू कश्मीर में 10,000 हजार अतिरिक्त जवानों की तैनाती के एक हफ्ते के भीतर बड़ा कदम उठाते हुए मोदी सरकार ने कश्मीर 28,000 और अतिरिक्त सुरक्षाबलों की तैनाती कर दिया है. इसके साथ ही सरकार ने सेना और वायुसेना को ऑपरेशनल अलर्ट पर रहने को कहा है.

जिसके चलते स्थानीय नागरिकों में पहचल शुरु हो गई है और लोगों ने तेजी से राशन पानी जुटाना शुरु कर दिया है. इस बीच राज्य के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला ने सरकार के इस अप्रत्याशित कदम पर ट्वीट कर कहा कि “ऐसी कौन सी वर्तमान परिस्थिति है जिसके चलते केंद्र सरकार ने सेना और वायुसेना को ऑपरेशनल अलर्ट पर ऱखा हुआ है, निश्चित तौर पर यह मामला 35ए अथवा परिसीमन से जुड़ा नहीं हैं. अगर सच में इस तरह का कोई अलर्ट जारी किया गया है तो यह बिल्कुल अलग चीज है.”

खास बात यह है कि इन सभी सुरक्षाबलों की राज्य के अति संवेदनशील माने जाने वाले इलाकों में भारी मात्रा में तैनाती की गई हैं. इसके अलावा राज्य के सभी जगहों पर अर्धसैनिक बलों ने कब्जा कर लिया है और प्रदेश पुलिस सिर्फ प्रतीकात्मक बन कर रह गई है.

घाटी में इतनी अधिक मात्रा में सुरक्षाबलों की तैनाती को लेकर हमारे सूत्रों का कहना है कि सरकार 370 और 35ए को लेकर कुछ बड़ा करने की तैयारी कर रही है. हालांकि सरकार का कहना है कि सीमापार से आतंकवादी कश्मीर में बड़ा हमला करने की फिराक में हैं जिसके मद्देनजर किया है.

लेकिन राजनीति के जानकारों का मानना है कि सरकार यह सब ध्यान भटकाने के लिए कह रही है जबकि असल में सरकार कुछ अलग और बड़ा करने की तैयारी कर रही है.

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