वकीलों और पुलिस की लड़ाई, कानून व्यवस्था पर सवाल


वकीलों और पुलिस की लड़ाई, कानून व्यवस्था पर सवाल

2 नवम्बर को तीस हजारी में पुलिस और वकीलों के बीच लड़ाई झगडे, तोड़ फोड़ और उसके बाद बढ़ती आपस में एक दूसरे के ऊपर हमला करने की वारदातें वकीलों और दिल्ली पुलिस दोनों को समाज में शर्मशार करने के लिए काफी है। इस वारदात ने समाज में दोनों की पहचान और इज्जत दोनों को कम किया है। और उनकी मानसिकता को दर्शाया है इसके लिए एक अधिवक्ता होने के नाते में शर्म महसूस कर रहा हूं।

 

दोस्तों पुलिस और वकील दोनो देश की कानून व्यवस्था के सबसे मजबूत स्तंभ है और यदि इन्हीं में एकजुटता नहीं होगी तो समाज में कानून का राज कैसे संभव हो पायेगा, ये बार एसोसिएशन और पुलिस विभाग को विचार करना बहुत जरूरी है। दोस्तों मैं मानता हूं पुलिस विभाग में कार्यरत पुलिस वालों की भाषा लिपि सही नहीं है या यूं कहें उन्हें थाने और चौकियों में आम आदमी से कैसे शब्दों का चयन करना है नहीं आता लेकिन ये भी सच है कि उनके ऊपर काम का इतना बोझ होता है। मौजूदा समय में हर पुलिस कर्मचारी लगभग 14 घण्टे ड्यूटी करता है, जिससे ज्यादातर पुलिस वाले मानसिक तनाव से ग्रस्त होते हैं जिससे एक सभ्य पुलिस व्यवस्था कायम नहीं हो पाती है, इस पर भी पुलिस विभाग को विचार करना आवश्यक है।

 

 

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दोस्तों देश की आजादी के बाद पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली बिल्कुल लार्ड कार्नवालिस की पुलिस के आधार पर ही की गरीब, किसी ने नहीं सोचा लार्ड कार्नवालिस की पुलिस गुलाम भारत की पुलिस व्यवस्था थी जो गुलाम भारतीय पर रूल करती थी और अब भारत आजाद हो चुका है लेकिन पुलिस कार्यप्रणाली नहीं बदली जिससे पुलिस में शिष्टाचार की कमी दिखाई देती है जिससे आज भी लोग पुलिस वालों को सभ्य नागरिक नहीं मानते और एक सभ्य और शरीफ़ शहरी इनसे दूरी रखता है। जिससे समाज में जो इज्जत इन्हें मिलनी चाहिए नहीं मिल पाती है। और समाज का हिस्सा होते हुए भी समाज में इनके साथ एक सोतेला व्यवहार देखने को मिलता है। जिसमें इनकी कम और इनको दी जाने वाली ट्रेनिंग ज्यादा जिम्मेदार है विचार करें।

 

स्वतंत्र भारत में सरकार के सभी विभागों की कार्यपद्धति की समीक्षा की गई और उनमें पायी जाने विली कमियों को रिफार्म के आधार पर सही करने की कोशिश की गई लेकिन पुलिस जो समाज की कानून व्यवस्था का एक स्तम्भ है उसकी कार्य प्रणाली की कभी सरकार द्वारा समीक्षा नहीं की गई और देश की आजादी के 72 वर्ष के बाद भी इनमें रिफार्म पद्धति नहीं अपनायी गयी जिसके कारण ना इनके कार्य पद्धति बदली और ना ही कभी ये आम शहरी से जुड़ पाते हैं, सरकार को पुलिस रिफॉर्म पर अवश्य विचार करना चाहिए, जिससे पुलिस व्यवस्था को मजबूत किया जा सके।

 

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मेरा अधिवक्ताओं से आग्रह है देश का हर पुलिस कर्मचारी हमारे तरह ही देश की कानून व्यवस्था का स्तम्भ है, इनसे अगर हम दोस्ताना व्यवहार नहीं रखेंगे तो समाज में अपराधियों के हौसले बढ़ेंगे और समाज में एक असिथरता का माहोल व्याप्त हो जायेगा जिससे हम भी प्रभावित होंगे, और इसमें हमारी भूमिका अहम होगी.

 

दोस्तों जब भी दो भाईयों में लड़ाई हुई है तब तब उनके विरोधी उस घर पर हावी हो गये है और दोनों भाइयों को नुक्सान झेलना पड़ा है और वो सामाजिक, आर्थिक और व्यवहारिक तीनों रुप में होती है और हमारे विरोधी अपराधियों के अलावा कोई नहीं है, इसलिए आओ इन्हें गले लगाएं और गलती किसी की भी हो अपनी तरफ से अपनी गलती मानते हुए तब तक गले लगाये रखे जब तक वो आपसे लिपट कर आपको भाई की तरह ना गले लगा लगे। हम अधिवक्ता और पुलिस विभाग दोनों समाज में कानून व्यवस्था स्थापित करने के महत्वपूर्ण स्तम्भ है और हमारे आपसी भाईचारे से ही लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत होती है।

 

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बेबाक पत्रकार रवीश कुमार को मिला ‘रैमॉन मैगसेसे’ पुरस्कार


बेबाक पत्रकार रवीश कुमार को मिला ‘रैमॉन मैगसेसे’ पुरस्कार

हिंदी पत्रकारिता जगत में अपनी अलग पहचान बना चुके NDTV के रवीश कुमार को बेस्ट अवार्ड से सम्मानित किया गया है. ये अवार्ड 2019 के ‘रैमॉन मैगसेसे’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इस अवार्ड को ‘रैमॉन मैगसेसे’ को एशिया का नोबेल पुरस्कार के नाम से जाना जाता है. यह पुरस्कार फिलीपीन्स के भूतपूर्व राष्ट्रपति रैमॉन मैगसेसे की याद में दिया जाता है.

आपको बता दें कि, सम्मान के लिए पुरस्कार संस्था ने ट्वीट कर बताया कि रवीश कुमार को यह सम्मान “बेआवाजों की आवाज बनने के लिए दिया गया है.” रवीश कुमार का कार्यक्रम ‘प्राइम टाइम’ ‘आम लोगों की वास्तविक, अनकही समस्याओं को उठाता है.” साथ ही प्रशस्ति पत्र में कहा गया की, ‘अगर आप लोगों की अवाज बन गए हैं, तो आप पत्रकार हैं.’ 

आपको बता दें कि, रवीश कुमार ऐसे छठे पत्रकार हैं जिनको यह पुरस्कार मिला है. इससे पहले अमिताभ चौधरी (1961), बीजी वर्गीज (1975), अरुण शौरी (1982), आरके लक्ष्मण (1984), पी. साईंनाथ (2007) को यह सम्मान मिल चुका है.

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28,000 और जवानों को कश्मीर में किया गया तैनात, हाई अलर्ट पर फोर्सेज


28,000 और जवानों को कश्मीर में किया गया तैनात, हाई अलर्ट पर फोर्सेज

हाल ही में जम्मू कश्मीर में 10,000 हजार अतिरिक्त जवानों की तैनाती के एक हफ्ते के भीतर बड़ा कदम उठाते हुए मोदी सरकार ने कश्मीर 28,000 और अतिरिक्त सुरक्षाबलों की तैनाती कर दिया है. इसके साथ ही सरकार ने सेना और वायुसेना को ऑपरेशनल अलर्ट पर रहने को कहा है.

जिसके चलते स्थानीय नागरिकों में पहचल शुरु हो गई है और लोगों ने तेजी से राशन पानी जुटाना शुरु कर दिया है. इस बीच राज्य के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला ने सरकार के इस अप्रत्याशित कदम पर ट्वीट कर कहा कि “ऐसी कौन सी वर्तमान परिस्थिति है जिसके चलते केंद्र सरकार ने सेना और वायुसेना को ऑपरेशनल अलर्ट पर ऱखा हुआ है, निश्चित तौर पर यह मामला 35ए अथवा परिसीमन से जुड़ा नहीं हैं. अगर सच में इस तरह का कोई अलर्ट जारी किया गया है तो यह बिल्कुल अलग चीज है.”

खास बात यह है कि इन सभी सुरक्षाबलों की राज्य के अति संवेदनशील माने जाने वाले इलाकों में भारी मात्रा में तैनाती की गई हैं. इसके अलावा राज्य के सभी जगहों पर अर्धसैनिक बलों ने कब्जा कर लिया है और प्रदेश पुलिस सिर्फ प्रतीकात्मक बन कर रह गई है.

घाटी में इतनी अधिक मात्रा में सुरक्षाबलों की तैनाती को लेकर हमारे सूत्रों का कहना है कि सरकार 370 और 35ए को लेकर कुछ बड़ा करने की तैयारी कर रही है. हालांकि सरकार का कहना है कि सीमापार से आतंकवादी कश्मीर में बड़ा हमला करने की फिराक में हैं जिसके मद्देनजर किया है.

लेकिन राजनीति के जानकारों का मानना है कि सरकार यह सब ध्यान भटकाने के लिए कह रही है जबकि असल में सरकार कुछ अलग और बड़ा करने की तैयारी कर रही है.

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