जोर आजमाइश दिल्ली में


जोर आजमाइश दिल्ली में

विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है भारत। लोकतंत्र की पहचान है चुनाव। जी हां, लोकतंत्र का महापर्व है चुनाव। दिल्ली में अभी चुनाव की घोषणा होनी है लेकिन चुनाव प्रचार दिल्ली के कोने-कोने में जारी है। जिस प्रकार से पिछले चुनाव में आप पार्टी का अभ्युदय हुआ उससे कई पार्टी एक साथ सामने आ गई हैं। छोटे छोटे दल अपने अपने दांव चल रहे हैं। इस बार के चुनाव में निश्चिततौर पर युवा वोटर की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। कह सकते हैं कि इस महापर्व में मतदाता की भागीदारी जरूरी है।

 

पिछले चुनाव में युवा वोटर के लिए निर्वाचन आयोग ने कई तरह के अभियान भी चलाए थे। इस बार दिल्ली में सबकी नजर है। दिल्ली में चुनाव प्रचार में पूरी जोर आजमाइश जारी है। अभी कई उतार चढ़ाव आऩे हैं। अक्सर ऐसा कहा जाता है कि एक वोट से क्या होता है। बहुत से लोगों की ऐसा कहना होता है। लेकिन आपके एक वोट से यह निर्णय होता है कि आप कैसी सरकार चाहते हैं। आप किस तरह का विकास चाहते हैं।

 

सभी पार्टियों की अपनी अपनी रणनीति होती है आप किस तरह का विकास चाहते हैं इसमें भी सभी पार्टियों की अपनी ही अपनी दिशा और दशा होती है। कोई निजीकरण पर ज्यादा जोर देता है तो कोई सरकारी व्यवस्था पर ज्यादा भरोसा करता है। आप जैसा चाहते है उसके अनुसार अपने वोट का पूरा इस्तेमाल करने का पूरा अधिकार है।

 

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चुनाव या निर्वाचन लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसके द्वारा जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है। चुनाव के द्वारा ही आधुनिक लोकतंत्रों के लोग विधायिकों के विभिन्न पदों पर आसीन होने के लिए व्यक्तियों को चुनते हैं। चुनाव के द्वारा ही क्षेत्रीय एवं स्थानीय निकायों के लिए भी व्यक्तियों का चुनाव होता है। वस्तुतः चुनाव का प्रयोग अब व्यापक स्तर पर होने लगा है। कई व्यवस्थाएं इससे जुड़ गई है। आपके जो प्रतिनिधि चुनकर आते हैं वह आपसे सीधे जुड़े होते हैं। यह खूबी है हमारे लोकतंत्र की।

 

जहां आप सीधे सरकार से जुड़ते हैं और सरकार में आपकी पार्टी रहे या न रहे लेकिन आप सीधे सरकार से जुड़े होते हैं। आप अपनी समस्या को सीधे सरकार के पास पहुंचा सकते हैं। यह खूबी है हमारे लोकतंत्र की। हमारे यहां त्रिस्तरीय लोकतांत्रिक व्यवस्था है। भारतीय लोकतंत्र में चुनाव प्रक्रिया के अलग-अलग स्तर हैं लेकिन मुख्य तौर पर संविधान में पूरे देश के लिए एक लोकसभा तथा पृथक-पृथक राज्यों के लिए अलग विधानसभा का प्रावधान है।

 

जहां नगर में पार्षद, विधायक और सांसद की व्यवस्था है जहां हम अपने घऱ मोहल्ले की समस्या को सीधे सरकार तक पहुंचा सकते हैं। जिससे सरकार भी सीधे जनता से जुड़ी होती है। उसे जनहित के मामले में सजग होना रहना होता है। और वह जनता के हित के फैसले लेती रहती है। नहीं तो जनता फिर से अपना निर्णय पांच साल बाद बदल देती है।

 

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यह बात नेताओं को पता होता है। उन्हें पता है कि उन्हें जवाब देने के लिए पांच साल बाद जनता के ही बीच जाना है। और यहीं बात उन्हें उत्तरदायी बनाता है। दिल्ली में इस बार सबकी नजर है। देशभर में यहां सबसे ज्यादा जागरूक मतदाता हैं। दिल्ली देश की राजधानी है और इसे राष्ट्रीय राजधानी का दर्जा प्राप्त है। जो अपने आप में अद्भूत है। 1911 में कोलकाता से राजधानी दिल्ली स्थानांतरित होने पर यह शहर सभी तरह की गतिविधि का केंद्र बन गया।

 

1956 में इसे केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा प्राप्त हुआ। देश के उत्तरी भाग में स्थित दिल्ली पूर्व दिशा को छोड़कर सभी ओर से हरियाणा राज्य से घिरी है, पूर्व में उत्तर प्रदेश की सीमा इससे लगती है। दिल्ली के इतिहास में 69 वां संविधान संशोधन विधेयक एक महत्वपूर्ण घटना है, जिसके फलस्वरूप राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र अधिनियम 1991 में लागू हो जिसके बाद दिल्ली में विधानसभा का गठन हुआ है। जिसके लिए ही हम अपने प्रतिनिधि चुन रहे हैं।

 

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संस्कृत है तो संस्कृति है!


संस्कृत है तो संस्कृति है!

देवनागरी लिपि लिखने तथा संस्कृत बोलने से बच्चों की जिह्वा तथा अंगुलियों का कड़ापन समाप्त हो जाता है और उनमें लचीलापन आ जाता है। यूरोपीय भाषाएं बोलने और लिखने में जिह्वा एवं अंगुलियों के कुछ भाग सक्रिय नहीं होते, जबकि संस्कृत में इन अंगों के अधिक भाग सक्रिय होते हैं।

 

स्पेन के एक छात्र ने वाराणसी में आकर संस्कृत की पढ़ाई की और इसमें पीएचडी करने के बाद अपन देश ही नहीं पूरे स्पेनिश बोले जाने क्षेत्र में संस्कृत का प्रचार प्रसार किया और उसने इसके पहले ही स्पेनिश से संस्कृत, संस्कृत से स्पेनिश का शब्दकोष भी लाया ताकि इस भाषा को आसानी से समझा जा सकता है। वह छात्र स्पेन का भारत में राजदूत भी रहा और अन्य राष्ट्र में कल्चर राजदूत भी रहा। यह सब कहने का मतलब इतना ही है कि आज भी संस्कृत में जो कुछ है शायद किसी और भाषा में उतना नहीं है।

 

संस्कृत : सभी भाषाओं की जननी

 

संस्कृत देव भाषा है। यह सभी भाषाओं की जननी है। विश्व की समस्त भाषाएं इसी के गर्भ से उद्भूत हुई हैं। वेदों की रचना इसी भाषा में होने के कारण इसे वैदिक भाषा भी कहा जाता है। यह भाषा अपनी दिव्य और दैवीय विशेषाओं के कारण आज भी उतनी ही प्रासंगिक एवं जीवंत है।

 

संस्कृत की इस समृद्धि ने पाश्चात्य विद्वानों को अपनी ओर आकर्षित किया। इस भाषा से प्रभावित होकर सर विलियम जोन्स ने 2 फरवरी, 1786 को ऐसियाटिक सोसायटी कोलकाता में कहा था, संस्कृत एक अद्भूत भाषा है। यह ग्रीक से अधिक पूर्ण, लैटिन से अधिक समृद्ध और अन्य किसी भी भाषा से अधिक परिष्कृत है। इसी कारण संस्कृत को सभी भाषाओं की जननी कहते हैं।

 

संस्कृत को प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा के अंतर्गत रखा जाता है और सभी भाषाओं की उत्पत्ति का सूत्रधार इसे माना जाता है। भाषाविद् मानते हैं कि सभी भाषाओं की उत्पत्ति का तार कहीं न कहीं से संस्कृत से जुड़ा हुआ है, क्योंकि वह सबसे पुरानी एवं समृद्ध भाषा है।

 

किसी भी भाषा की विकासयात्रा में उसकी यह विशेषता जुड़ी होती है कि वह भविष्य में विकसित होने की कितनी क्षमता रखती है। जिस भाषा में यह क्षमता विद्यमान होती है, वह दीर्घकाल तक अपना अस्तित्व बनाए रखती है। परंतु भाषा में उपर्युक्त विशेषता नहीं होती है, उसकी विकास यात्रा थम जाती है।

 

संस्कृत भाषा की अनगिनत विशेषताएं:

 

यह सच है कि संस्कृत भाषा आज प्रचलन में नहीं है, परंतु इसमें अनगिनत विशेषताएं मौजूद हैं। इन्हीं विशेषताओं को लेकर कंप्यूटर के क्षेत्र में प्रयोग चल रहा है। कंप्यूटर विशेषज्ञ इस तथ्य से सहमत हैं कि यदि संस्कृत को कंप्यूटर की डिजिटल अंक भाषा में प्रयोग करने की तकनीक खोजी जा सके तो भाषा जगत के साथ कंप्यूटर के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन देखे जा सकते हैं। जिस दिन यह परिकल्पना साकार एवं मूर्तरूप लेगी, एक नए युग का उदय होगा।

 

संस्कृत उदीयमान भविष्य की एक महत्वपूर्ण धरोहर है। अपने देश में संस्कृत वैदिक भाषा बनकर सिमट गई है। इसे विद्धानों एवं विशेषज्ञों की भाषा मानकर इससे परहेज किया जाता है। किसी अन्य भाषा की तुलना में इसे महत्व ही नहीं दिया जाता है,

 

क्योंकि वर्तमान व्यावसायिक युग में उस भाषा को वरीयता एवं प्राथमिकता प्रदान की जाती है, जिसका व्यावसायिक मूल्य सर्वोपरि होता है। कर्मकांड के क्षेत्र में इसे महत्व तो मिला है, परंतु कर्मकांड की वैज्ञानिकता का लोप हो जाने से इसे अंधविश्वास मानकर संतोष कर लिया जाता है, पर इस भाषा के महत्व को समझ कर इसका प्रयोग किया जाए, तो इससे अनगिनत लाभ हो सकते हैं।

 

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सेंट जेम्स इंडिपेंडेंट स्कूल, लंदन में संस्कृत की प्रसिद्धी

 

संस्कृत की विशिष्टता को समझकर लंदन की एक पाठशाला ने अपने जूनियर डिविजन में इसकी शिक्षा को अनिवार्य बना दिया है। लंदन में पाठशाला के अधिकारियों की मान्यता है कि संस्कृत का ज्ञान होने से अऩ्य भाषाओं को सीखने एवं संस्कृत का ज्ञान होने से अन्य भाषाओं को सीखने एवं समझने की क्षमता में अभिवृद्धि होती है।

 

इसको सीखने से गणित एवं विज्ञान को हल करने एवं समझने में आसानी होती है। सेंट जेम्स इंडिपेंडेंट स्कूल नामक यह विद्यालय लंदन के कैनिंगस्टर ओलंपिया क्षेत्र की डेसर्स स्ट्रीट में अवस्थित है। पांच से दस वर्ष तक की आयु के इसके अधिकांश छात्र कॉकेशियन हैं। इस विद्यालय की आरंभिक कक्षाओं में संस्कृत अनिवार्य विषय के रूप में सम्मिलित हैं।

 

इस पाठशाला के शिक्षकों ने अनेक शोध परीक्षण करने के पश्चात अपने निष्कर्ष में पाया कि संस्कृत का ज्ञान बच्चों के सर्वागीण विकास में सहायक होता है। संस्कृत जानने वाला छात्र अन्य भाषाओं के साथ ही गणित, विज्ञान एवं कंप्यूटर आदि की शीघ्रता से सीख जाता है।

 

यह निष्कर्ष उस विद्यालय के विगत बारह वर्ष के अनुभव से प्राप्त हुआ है। संस्कृत अपनी विशिष्ट ध्वन्यात्मकता के कारण प्रमस्तिष्कीय (सेरेब्रल) क्षमता में वृद्धि करती है। इससे सीखने की क्षमता, स्मरणशक्ति, निर्णय क्षमता में आश्चर्यजनक अभिवृद्धि होती है।

 

संभवतः यही कारण है कि पहले बच्चों में विद्यारंभ संस्कार कराया जाता था और उसमें मंत्र लेखन के साथ बच्चे को जप करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता था। संस्कृत से छात्रों की गतिदायक कुशलता मोटर स्किल्स भी विकसित होती है। संस्कृति की रक्षा एवं विकास के लिए संस्कृत को महत्व प्रदान करना आवश्यक है। इस विरासत को हमें फिर से शिरोधार्य करना होगा, तभी इसका विकास एवं उत्थान संभव है।

 

 

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क्या भूखमरी का कोई इलाज है


क्या भूखमरी का कोई इलाज है

-चिरंजीत शर्मा , एडवोकेट

विश्व भूखमरी का इंडेक्स विश्व के पटल पर प्रस्तुत किया गया और 119 देशों में भारत को 102 से नवाजा गया, इंडेक्स के अनुसार भारत में आजादी के 74 साल के बाद भी लगभग 31 प्रतिशत जनसंख्या भूखमरी में जीती है, पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल की स्थिति भी भारत से बहुत बेहतर है जबकि सरकार के अनुसार अगर विकास की गंगा कहीं बह रही है तो वह भारत देश ही है। लेकिन वो विकास किस तरह का है मेरी समझ में नहीं आता क्योंकि देश एक घर है और सरकार घर की मुखिया और जब भी कोई भी घर विकास करता है तो सबसे पहले उसके घर के सभी सदस्यों को दो टाइम की रोटी जरुर मिलती है लेकिन जहां 30 प्रतिशत जनता को रोटी ही ना मिले वो देश कितना विकास कर रहा होगा ये सभी को विचार करना चाहिए।और वो भी तब जब जिस देश का संविधान का आधार है कि सबको पेट भर भोजन देने की व्यवस्था सरकार का प्रथम कर्तव्य होगा। और उसके बाद जिस देश के संसद में भोजन उपलब्धता कानून के ऊपर बहस करके कानून पास किया गया हो जिसका मूल उद्देश्य हर नागरिक को भोजन उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी होगी, उसके बाद 119 देशों में भारत का भूखमरी में 102 वां स्थान विश्व के पटल पर हमारा कितना मान बढ़ा रहे हैं। ये विचार करने योग्य है विचार जरूर करें।

 

दोस्तों भारतीय संस्कृति के अनुसार

 

हमे बेजान वस्तुओं के साथ भी इंसानों जैसा ही व्यवहार करना चाहिए,  इससे हमारी सुचिता  प्रतीत होने लगती है। जब कोई बेजान वस्तुओं, मानव,पशु पक्षियों, पेड़-पौधों के साथ  प्रेमपूर्ण होता है, तो इससे अंतस की पवित्रता की पुष्टि होती है, यह हमारे सहज और सरल होने का परिचायक है, इससे मानव होने का प्रबल आभास होता है। मानस की यही अवस्था महानता का प्रतीक है। इसीलिए किसी बेजान वस्तु के साथ ग़लती से भी यदि दुर्व्यवहार हो जाये तो उससे भी माफ़ी माँग ली जानी चाहिए, इससे वह वस्तु तो कुछ न बोल सकेगी, पर हम इंसान है, इसकी पुष्टि आवश्य हो जायेगी, और यही मन की स्थिति एक दिन हमे महान बनाने मे सहायक होगी, इसी से हमारे होने की, हमारे बीईंग की पुष्टि होगी। और जब हमारा बीईंग शुद्ध होगा, पवित्र होगा, तो ही हमारा सत्य से साक्षात्कारः होगा। यही स्थिति आनन्द की स्थिति है, और यही परम स्थिति है। लेकिन शायद आज भारत में इसकी बहुत कमी है तभी तो सरकार के साथ हमें अपने भूखे देश वासी दिखाई नहीं देते और यदि दिखाई देते हैं तो हमारी संवेदनशीलता कहा चली गई है विचार करें।

 

पिछले दिनों हमारे भारतीय मूल के एक अर्थशास्त्री को नोबल से नवाजा गया है और हम और सबसे पहले सरकार ने अपने आपको महान बताते हुए खुद अपनी पीठ थपथपायी भी दूसरी ओर से ख़बर आती है कि हमारे ही देश के एक नागरिक ने अपने बैंक के अव्यवस्थित वितीय प्रबंध के चलते अपनी जान गंवा दी है और तुरंत सरकार के वित्त मंत्री ने सरकार की भूमिका से इनकार कर के तुरंत इस घटना से पल्ला झाड़ लिया है। हमें विचार करना है कि हमें  गर्व करना चाहिए या शर्म विचार जरूर करें। ये तो हम कर ही सकते हैं।

विश्व में भी  विकास करने की हौड लगी है और सभी देश अपनी सुविधानुसार विकास की दौड़ में अग्रसर है। तभी विश्व के सभी पत्रकार विकास का लेख लिखने के लिए एक देश से दूसरे देश में भागे फिर रहे हैं,  इसी विकास को देखने एक पत्रकार सिरिया पहुंचा और उस  पत्रकार ने उस सीरियाई लड़की से एक क्लिक के लिए मुस्कुराने के लिए कहा ... वह अपनी आँखों में सभी दर्द के साथ मुस्कुराई। यह तस्वीर एक घृणित और शर्मनाक युद्धरत दुनिया का प्रतीक है जिसमें हम रह रहे हैं  और हम नहीं जानते इससे फायदा किसका होगा, विचार जरूर करें।

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