डर से डरिए नहीं


डर से डरिए नहीं

-सलिल सरोज

कार्यकारी अधिकारी

लोक सभा सचिवालय

 

डर अपने आप मौजूद नहीं हो सकता। यह एक अमूर्तता नहीं है। एक अमूर्त अस्तित्व में तभी आता है जब कोई डर से एक विचार या अवधारणा या गतिविधि में भाग जाता है। माना कि एक डर है। एक का दिमाग इसका सामना करने में असमर्थ होता है और उससे बच निकलने की कोशिश करता है; फिर उस पलायन से उत्पन्न किसी भी विचार या गतिविधि का शिकार होता जाता है। विरोधाभास का जीवन अधिक भय, अधिक संघर्ष और अस्तित्व की सभी जटिलताओं को लाता है। इसलिए आपको डर को समझना होगा क्योंकि डर भ्रम पैदा करता है और दिमाग को सुस्त बनाता है। मुझे नहीं पता कि जब आप भयभीत होने पर ध्यान नहीं देते हैं, तो आपका मन बिल्कुल कैसे हटता है, खुद को कैसे अलग करता है और किसी को तुरंत मदद करने के लिए कैसे देखता है; यह उस तथ्य का सामना करने के अलावा गतिविधि के माध्यम से, झूठ के माध्यम से एक दीवार कैसे बनाता है। एक मन जो डर में रहता है, एक मृत मन है, एक सुस्त दिमाग है; यह एक ऐसा मन है जो स्पष्ट रूप से, प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख सकता, ना ही सुन सकता है। इसलिए दूसरों के साथ, समाज के साथ, हर चीज के साथ और पूरी तरह से भय से मुक्त होना बहुत महत्वपूर्ण है, न कि आंशिक रूप से, न ही अलग-अलग अवसरों पर, बल्कि पूरी तरह से। और यह बिल्कुल संभव है। अतः भय एक अमूर्तता नहीं है, यह ऐसी चीज नहीं है जिससे आप भाग सकते हैं; आप जहाँ भाग कर जाएँगे,यह आपको अपने मूल रूप या किसी अन्य रूप में जरूर मिलेगा। चाहे आप एक दिन या एक वर्ष के लिए भाग जाएँ, यह आपको कहीं भी पकड़ लेता है और आपके साथ जाता है। आप अपनी आँखें इससे दूर कर सकते हैं, लेकिन यह मौजूद रहता है और किसी न किसी रूप में अपनी उपस्थिति भी दर्ज कराता रहता है।

 

डर किसी और चीज के संबंध में ही मौजूद हो सकता है। मैं जनता की राय से डरता हूँ, मैं अपनी पत्नी से डरता  हूँ, मैं अपने मालिक से डरता  हूँ, मैं अपनी नौकरी खोने से डरता हूँ, मैं मौत से डरता  हूँ, मैं दर्द से डरता  हूँ; मैं स्वस्थ नहीं हूँ, मैं स्वस्थ रहना चाहूँगा और मैं फिर से बीमार पड़ने से डरता  हूँ; मैं भयभीत हूँ क्योंकि मैं अकेला  हूँ; मैं भयभीत  हूँ क्योंकि कोई भी मुझसे प्यार नहीं करता है, किसी को भी मेरे लिए प्यार की भावना नहीं है; मैं किसी के न होने से भयभीत  हूँ। भय, चेतन और अचेतन के विभिन्न रूप हैं। यदि आप सभी जागरूक हैं, तो संकीर्ण अर्थ में नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर, आप स्पष्ट भय देख सकते हैं: नौकरी खोने और इसलिए आपके ऊपर के व्यक्ति के द्वारा इस्तेमाल होते रहने का ख़तरा; खुद को पूरा न होते हुए देखने से भयभीत होना; किसी के न होने से भयभीत होना, गलत होने से भयभीत होना-ये सब मानसिक दशाओं को हथियार बना कर डर और भय की भूमि तैयार करते हैं जो आगे चलकर हमारे स्वभाव और चरित्र का हिस्सा सा बन जाता है। डर को समझना होगा।

मैं अकेला होने से डरता  हूँ। क्या आप जानते हैं कि इस शब्द का क्या अर्थ है? क्या आपने कभी महसूस किया है कि अकेला होना क्या है? शायद नहीं, क्योंकि आप अपने परिवार से घिरे रहते हैं, हमेशा अपनी नौकरी के बारे में सोचते रहते हैं, किताब पढ़ते हैं, रेडियो सुनते हैं या अखबारों की गपशप में फँसे रहते हैं। तो शायद आप कभी नहीं जानते कि पूरी तरह से अलग होने की अजीब भावना क्या होती है: अलग होकर जीने की परिकल्पना किस तरह के भय को जन्म देती है और यह भय किस तरह जीवन की पूर्ण परिपाटी को धूल-धूसरित करने की हिमाकत करने की चेष्टा करने लगताहै।आपके पास कभी-कभार इसकी सूचना हो सकती है, लेकिन शायद आप इसके साथ सीधे संपर्क में नहीं आए हैं, जैसा कि आप दर्द, भूख या सेक्स के साथ करते हैं। लेकिन अगर आप उस अकेलेपन को नहीं समझते हैं जो डर का कारण है, तो आप डर को नहीं समझेंगे और इससे मुक्त रहेंगे। जागरूक मन शिक्षित दिमाग है, आधुनिक तकनीकी दिमाग जो हर दिन कार्यालय में जाता है, जो ऊब गया है, जो इसे सभी की दिनचर्या से तंग आ गया है, खुद के लिए कुछ करने के प्यार की कमी महसूस करने लगता है। तो चेतन मन यांत्रिक मन बन जाता है। यह यंत्रवत सोच सकता है, यह कार्यालय और कार्य पर जा सकता है। फिर बहुत कुछ अचेतन है जो बहुत गहरा है, जिसके लिए बड़ी पैठ, समझ की जरूरत होती है। आप चेतना की इस पूरी संरचना को समझ सकते हैं, जो आप एक इंसान के रूप में हैं।  इसके लालच, ईर्ष्या, महत्वाकांक्षा, निराशा के साथ समाज की संपूर्ण मनोवैज्ञानिक संरचना को पूरी तरह से समाप्त किया जा सकता है। आप चेतना की पूरी प्रक्रिया का चरण दर चरण विश्लेषण कर सकते हैं। लेकिन विश्लेषण मन को मुक्त नहीं करेगा। फिर मन को महत्वाकांक्षा, लालच, ईर्ष्या, क्रोध, ईर्ष्या और सत्ता की मांग से क्या मुक्त करेगा? हमारे पास सभी जानवरों की प्रवृत्ति भी है, सचेतन रूप से और साथ ही साथ अनजाने में भी। और हम इस पूरी मनोवैज्ञानिक संरचना को समझ सकते हैं और इस पशुवत, मनुष्य के साथ मनुष्य के सहज संबंध से पूरी तरह मुक्त हो सकते हैं। हमें डर को समझना होगा और पूरी तरह से मुक्त होना होगा चाहे प्रक्रिया कोई भी ईजाद कर ली जाए। आप इसे केवल तभी कर सकते हैं जब किसी प्रकार का कोई डर बच न जाए। अगर आप डर से छुटकारा पाने के लिए कोई रास्ता, कोई विधि, कोई प्रणाली चाहते हैं, तो आप हमेशा के लिए भय में फँस जाएँगे। लेकिन अगर आप डर को समझते हैं, जो केवल तब हो सकता है जब आप सीधे इसके संपर्क में आते हैं तो आप कुछ भी करते हैं।

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संस्कृत है तो संस्कृति है!


संस्कृत है तो संस्कृति है!

देवनागरी लिपि लिखने तथा संस्कृत बोलने से बच्चों की जिह्वा तथा अंगुलियों का कड़ापन समाप्त हो जाता है और उनमें लचीलापन आ जाता है। यूरोपीय भाषाएं बोलने और लिखने में जिह्वा एवं अंगुलियों के कुछ भाग सक्रिय नहीं होते, जबकि संस्कृत में इन अंगों के अधिक भाग सक्रिय होते हैं।

 

स्पेन के एक छात्र ने वाराणसी में आकर संस्कृत की पढ़ाई की और इसमें पीएचडी करने के बाद अपन देश ही नहीं पूरे स्पेनिश बोले जाने क्षेत्र में संस्कृत का प्रचार प्रसार किया और उसने इसके पहले ही स्पेनिश से संस्कृत, संस्कृत से स्पेनिश का शब्दकोष भी लाया ताकि इस भाषा को आसानी से समझा जा सकता है। वह छात्र स्पेन का भारत में राजदूत भी रहा और अन्य राष्ट्र में कल्चर राजदूत भी रहा। यह सब कहने का मतलब इतना ही है कि आज भी संस्कृत में जो कुछ है शायद किसी और भाषा में उतना नहीं है।

 

संस्कृत : सभी भाषाओं की जननी

 

संस्कृत देव भाषा है। यह सभी भाषाओं की जननी है। विश्व की समस्त भाषाएं इसी के गर्भ से उद्भूत हुई हैं। वेदों की रचना इसी भाषा में होने के कारण इसे वैदिक भाषा भी कहा जाता है। यह भाषा अपनी दिव्य और दैवीय विशेषाओं के कारण आज भी उतनी ही प्रासंगिक एवं जीवंत है।

 

संस्कृत की इस समृद्धि ने पाश्चात्य विद्वानों को अपनी ओर आकर्षित किया। इस भाषा से प्रभावित होकर सर विलियम जोन्स ने 2 फरवरी, 1786 को ऐसियाटिक सोसायटी कोलकाता में कहा था, संस्कृत एक अद्भूत भाषा है। यह ग्रीक से अधिक पूर्ण, लैटिन से अधिक समृद्ध और अन्य किसी भी भाषा से अधिक परिष्कृत है। इसी कारण संस्कृत को सभी भाषाओं की जननी कहते हैं।

 

संस्कृत को प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा के अंतर्गत रखा जाता है और सभी भाषाओं की उत्पत्ति का सूत्रधार इसे माना जाता है। भाषाविद् मानते हैं कि सभी भाषाओं की उत्पत्ति का तार कहीं न कहीं से संस्कृत से जुड़ा हुआ है, क्योंकि वह सबसे पुरानी एवं समृद्ध भाषा है।

 

किसी भी भाषा की विकासयात्रा में उसकी यह विशेषता जुड़ी होती है कि वह भविष्य में विकसित होने की कितनी क्षमता रखती है। जिस भाषा में यह क्षमता विद्यमान होती है, वह दीर्घकाल तक अपना अस्तित्व बनाए रखती है। परंतु भाषा में उपर्युक्त विशेषता नहीं होती है, उसकी विकास यात्रा थम जाती है।

 

संस्कृत भाषा की अनगिनत विशेषताएं:

 

यह सच है कि संस्कृत भाषा आज प्रचलन में नहीं है, परंतु इसमें अनगिनत विशेषताएं मौजूद हैं। इन्हीं विशेषताओं को लेकर कंप्यूटर के क्षेत्र में प्रयोग चल रहा है। कंप्यूटर विशेषज्ञ इस तथ्य से सहमत हैं कि यदि संस्कृत को कंप्यूटर की डिजिटल अंक भाषा में प्रयोग करने की तकनीक खोजी जा सके तो भाषा जगत के साथ कंप्यूटर के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन देखे जा सकते हैं। जिस दिन यह परिकल्पना साकार एवं मूर्तरूप लेगी, एक नए युग का उदय होगा।

 

संस्कृत उदीयमान भविष्य की एक महत्वपूर्ण धरोहर है। अपने देश में संस्कृत वैदिक भाषा बनकर सिमट गई है। इसे विद्धानों एवं विशेषज्ञों की भाषा मानकर इससे परहेज किया जाता है। किसी अन्य भाषा की तुलना में इसे महत्व ही नहीं दिया जाता है,

 

क्योंकि वर्तमान व्यावसायिक युग में उस भाषा को वरीयता एवं प्राथमिकता प्रदान की जाती है, जिसका व्यावसायिक मूल्य सर्वोपरि होता है। कर्मकांड के क्षेत्र में इसे महत्व तो मिला है, परंतु कर्मकांड की वैज्ञानिकता का लोप हो जाने से इसे अंधविश्वास मानकर संतोष कर लिया जाता है, पर इस भाषा के महत्व को समझ कर इसका प्रयोग किया जाए, तो इससे अनगिनत लाभ हो सकते हैं।

 

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सेंट जेम्स इंडिपेंडेंट स्कूल, लंदन में संस्कृत की प्रसिद्धी

 

संस्कृत की विशिष्टता को समझकर लंदन की एक पाठशाला ने अपने जूनियर डिविजन में इसकी शिक्षा को अनिवार्य बना दिया है। लंदन में पाठशाला के अधिकारियों की मान्यता है कि संस्कृत का ज्ञान होने से अऩ्य भाषाओं को सीखने एवं संस्कृत का ज्ञान होने से अन्य भाषाओं को सीखने एवं समझने की क्षमता में अभिवृद्धि होती है।

 

इसको सीखने से गणित एवं विज्ञान को हल करने एवं समझने में आसानी होती है। सेंट जेम्स इंडिपेंडेंट स्कूल नामक यह विद्यालय लंदन के कैनिंगस्टर ओलंपिया क्षेत्र की डेसर्स स्ट्रीट में अवस्थित है। पांच से दस वर्ष तक की आयु के इसके अधिकांश छात्र कॉकेशियन हैं। इस विद्यालय की आरंभिक कक्षाओं में संस्कृत अनिवार्य विषय के रूप में सम्मिलित हैं।

 

इस पाठशाला के शिक्षकों ने अनेक शोध परीक्षण करने के पश्चात अपने निष्कर्ष में पाया कि संस्कृत का ज्ञान बच्चों के सर्वागीण विकास में सहायक होता है। संस्कृत जानने वाला छात्र अन्य भाषाओं के साथ ही गणित, विज्ञान एवं कंप्यूटर आदि की शीघ्रता से सीख जाता है।

 

यह निष्कर्ष उस विद्यालय के विगत बारह वर्ष के अनुभव से प्राप्त हुआ है। संस्कृत अपनी विशिष्ट ध्वन्यात्मकता के कारण प्रमस्तिष्कीय (सेरेब्रल) क्षमता में वृद्धि करती है। इससे सीखने की क्षमता, स्मरणशक्ति, निर्णय क्षमता में आश्चर्यजनक अभिवृद्धि होती है।

 

संभवतः यही कारण है कि पहले बच्चों में विद्यारंभ संस्कार कराया जाता था और उसमें मंत्र लेखन के साथ बच्चे को जप करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता था। संस्कृत से छात्रों की गतिदायक कुशलता मोटर स्किल्स भी विकसित होती है। संस्कृति की रक्षा एवं विकास के लिए संस्कृत को महत्व प्रदान करना आवश्यक है। इस विरासत को हमें फिर से शिरोधार्य करना होगा, तभी इसका विकास एवं उत्थान संभव है।

 

 

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क्या भूखमरी का कोई इलाज है


क्या भूखमरी का कोई इलाज है

-चिरंजीत शर्मा , एडवोकेट

विश्व भूखमरी का इंडेक्स विश्व के पटल पर प्रस्तुत किया गया और 119 देशों में भारत को 102 से नवाजा गया, इंडेक्स के अनुसार भारत में आजादी के 74 साल के बाद भी लगभग 31 प्रतिशत जनसंख्या भूखमरी में जीती है, पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल की स्थिति भी भारत से बहुत बेहतर है जबकि सरकार के अनुसार अगर विकास की गंगा कहीं बह रही है तो वह भारत देश ही है। लेकिन वो विकास किस तरह का है मेरी समझ में नहीं आता क्योंकि देश एक घर है और सरकार घर की मुखिया और जब भी कोई भी घर विकास करता है तो सबसे पहले उसके घर के सभी सदस्यों को दो टाइम की रोटी जरुर मिलती है लेकिन जहां 30 प्रतिशत जनता को रोटी ही ना मिले वो देश कितना विकास कर रहा होगा ये सभी को विचार करना चाहिए।और वो भी तब जब जिस देश का संविधान का आधार है कि सबको पेट भर भोजन देने की व्यवस्था सरकार का प्रथम कर्तव्य होगा। और उसके बाद जिस देश के संसद में भोजन उपलब्धता कानून के ऊपर बहस करके कानून पास किया गया हो जिसका मूल उद्देश्य हर नागरिक को भोजन उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी होगी, उसके बाद 119 देशों में भारत का भूखमरी में 102 वां स्थान विश्व के पटल पर हमारा कितना मान बढ़ा रहे हैं। ये विचार करने योग्य है विचार जरूर करें।

 

दोस्तों भारतीय संस्कृति के अनुसार

 

हमे बेजान वस्तुओं के साथ भी इंसानों जैसा ही व्यवहार करना चाहिए,  इससे हमारी सुचिता  प्रतीत होने लगती है। जब कोई बेजान वस्तुओं, मानव,पशु पक्षियों, पेड़-पौधों के साथ  प्रेमपूर्ण होता है, तो इससे अंतस की पवित्रता की पुष्टि होती है, यह हमारे सहज और सरल होने का परिचायक है, इससे मानव होने का प्रबल आभास होता है। मानस की यही अवस्था महानता का प्रतीक है। इसीलिए किसी बेजान वस्तु के साथ ग़लती से भी यदि दुर्व्यवहार हो जाये तो उससे भी माफ़ी माँग ली जानी चाहिए, इससे वह वस्तु तो कुछ न बोल सकेगी, पर हम इंसान है, इसकी पुष्टि आवश्य हो जायेगी, और यही मन की स्थिति एक दिन हमे महान बनाने मे सहायक होगी, इसी से हमारे होने की, हमारे बीईंग की पुष्टि होगी। और जब हमारा बीईंग शुद्ध होगा, पवित्र होगा, तो ही हमारा सत्य से साक्षात्कारः होगा। यही स्थिति आनन्द की स्थिति है, और यही परम स्थिति है। लेकिन शायद आज भारत में इसकी बहुत कमी है तभी तो सरकार के साथ हमें अपने भूखे देश वासी दिखाई नहीं देते और यदि दिखाई देते हैं तो हमारी संवेदनशीलता कहा चली गई है विचार करें।

 

पिछले दिनों हमारे भारतीय मूल के एक अर्थशास्त्री को नोबल से नवाजा गया है और हम और सबसे पहले सरकार ने अपने आपको महान बताते हुए खुद अपनी पीठ थपथपायी भी दूसरी ओर से ख़बर आती है कि हमारे ही देश के एक नागरिक ने अपने बैंक के अव्यवस्थित वितीय प्रबंध के चलते अपनी जान गंवा दी है और तुरंत सरकार के वित्त मंत्री ने सरकार की भूमिका से इनकार कर के तुरंत इस घटना से पल्ला झाड़ लिया है। हमें विचार करना है कि हमें  गर्व करना चाहिए या शर्म विचार जरूर करें। ये तो हम कर ही सकते हैं।

विश्व में भी  विकास करने की हौड लगी है और सभी देश अपनी सुविधानुसार विकास की दौड़ में अग्रसर है। तभी विश्व के सभी पत्रकार विकास का लेख लिखने के लिए एक देश से दूसरे देश में भागे फिर रहे हैं,  इसी विकास को देखने एक पत्रकार सिरिया पहुंचा और उस  पत्रकार ने उस सीरियाई लड़की से एक क्लिक के लिए मुस्कुराने के लिए कहा ... वह अपनी आँखों में सभी दर्द के साथ मुस्कुराई। यह तस्वीर एक घृणित और शर्मनाक युद्धरत दुनिया का प्रतीक है जिसमें हम रह रहे हैं  और हम नहीं जानते इससे फायदा किसका होगा, विचार जरूर करें।

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