कोरोना: अभी रूकना मना है, संभल कर चलना है...


कोरोना: अभी रूकना मना है, संभल कर चलना है...

सुभाष चन्द्र 



आज पूरा विश्व संकट के दौर से गुज़र रहा है। कोरोना नामक महामारी से दुनिया भर के विकसित कहे जाने वाले देशों तक में होने वाले त्राहिमाम को देखकर आशंका होती है कि कहीं ये एक युग के अंत की शुरुआत तो नहीं। क्योंकि जैसी वर्तमान स्थिति है, इसमें इस महामारी का अगर कोई एकमात्र इलाज है तो वो है स्वयं को इससे बचाना। तो जब तक लॉक डाउन है तबतक हम घरों में सुरक्षित हैं लेकिन जीवन भर न तो आप लॉक डाउन में रह सकते हैं और ना हो कोई देश। इसलिए आवश्यक हो जाता है कि हम पूरे विश्व पर आई इस विपत्ति से कुछ सबक सीखें।

जय हो! जय-जय हो। भारत की जय हो, जो भारत आगे है और वायरस पीछे है! बकौल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी- हमने समस्या (वायरस) का इंतजार नहीं किया, बल्कि जैसे ही दिखी (वायरस आता दिखा) उसी समय उसे रोकने का प्रयास किया। तभी भारत की तुलना में दुनिया के सामर्थ्यवान देशों में कोरोना के केस 25 से 30 गुना बढ़े हैं। भारत जिस मार्ग पर चला है, उसकी चर्चा दुनिया भर में हो रही है। जाहिर है भारत के आगे कोरोना का सत्य और विज्ञान दोनों पानी भर रहे है! भारत में कोरोना हेडलाइन में नहीं है, बल्कि विजेता नरेंद्र मोदी हेडलाइन में हैं। भारत में कोरोना के सत्य से विज्ञान नहीं लड़ रहा है, उसे टेस्ट और इलाज की जरूरत नहीं है। भारत में तो बेचारा कोरोना झूठ व हेडलाइन मैनेजमेंट की गर्मी से अकाल मृत्यु को प्राप्त हो रहा है!

तभी चमत्कार। वाह! भारत, वाह! 21 दिन में भारत के लॉकडाउन ने चीन के भेजे वायरस को भूखा मार डाला। वायरस में यदि कुछ सांस बची भी होगी तो तीन मई तक मां भारती का काढ़ा उसकी कपाल क्रिया कर देगा। 21 अप्रैल से भारत की छुकछुक आर्थिकी फिर पटरियों पर छुक-छुक दौड़ने लगेगी। दुनिया जहां वायरस के विषाणुओं के सत्य में विज्ञान के बूते विश्वयुद्ध लड रही है वहीं भारत ने, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जादू-मंतर करके ही जीत की ओर बढ़ने का ऐलान कर दिया है। ‘लोगों ने कष्ट सह कर देश को बचाया’, ‘हमारे इस भारतवर्ष को बचाया’, ‘तपस्या, त्याग की वजह से भारत कोरोना से होने वाले नुकसान को काफी हद तक टालने में सफल रहा है।’ सोचें, दुनिया के 195 देशों में किस देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या चांसलर ने ऐसा विजय संदेश दिया है?

जाहिर है किसी ने नहीं। कौन सा देश आर्थिकी को छुकछुक ही सही (चीन पर न सोचें क्योंकि वह तो वायरस निर्यातक है) पटरी पर चलाने की तारीख, रोडमैप का ऐलान कर प्रोग्राम बना चुका है? कोई नहीं! तभी भारत आज की वैश्विक मैराथन में बिना दौड़े ही विश्व विजेता है। वायरस भारत में फेल हो गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रवक्ता ने 31 मार्च को ही दुनिया को बता दिया था कि भारत में संक्रमण का कर्व चपटा हो रहा है। (Govt data reveal lockdown may have flattened the curve)। तभी हमें न टेस्ट की जरूरत है, न अस्पताल, पीपीई, डॉक्टरों की जरूरत है। वायरस है कहां जो मौत या संक्रमण का आंकड़ा बने। कहां है अस्पतालों की और दौड़ते अधमरे वायरस रोगी? दुनिया भले मैराथन में दौड़ रही है, टेस्ट कर-करके मरीजों को खुद अस्पताल पहुंचा रही है, मरीजों की, मौतों की सच्ची गिनती करके लाशों का ढेर बना रही है, वायरस उन्हें दौड़ा रहा है, मार रहा है लेकिन भारत में वायरस फ्लैट हो गया है, वह हांफते हुए भारत से भाग रहा है और भारत मैराथन में बिना भागे ही विजय पथ के मुकाम का फीता पकड़े हुए है। दरअसल दुनिया मूर्ख है जो सत्य और विज्ञान से चिपकी हुई है। भारत की तरह बाकी देशों को भी टेस्ट कराने आदि की चिंता छोड़ देनी चाहिए थी। विश्व गुरू नरेंद्र मोदी से यह गुरू ज्ञान ले लेना था कि तमाम संकटों का रामबाण नुस्खा है भाषण और हेडलाइन मैनेजमेंट। दुनिया टेस्ट कराने, विज्ञान के हथियारों, डॉक्टरों के उपयोग में वक्त जाया कर रही है उसकी जगह यदि हेडलाइन मैनेजमेंट होता, सोशल मीडिया के लंगूरों को मसला सुपुर्द होता तो अमेरिका-यूरोप भी कहते मिलते कि भला लोग कहां मर रहे हैं? इतने तो हर साल फ्लू से मरते हैं। कोरोना वायरस है ही नहीं, यह तो फ्लू है।
 अगर मानव सभ्यता के इतिहास पर नज़र डालें तो मानव ने शुरुआत से ही अनेक चुनौतियों का सामना करके अपने बाहुबल और बौद्धिक क्षमता के सहारे ही वर्तमान मुकाम को हासिल किया है। इस पूरे सफर में अगर उसका कोई सबसे बड़ा मित्र था, तो वो था उसका आत्म विश्लेषणात्मक स्वभाव जो उसे अपनी गलतियों से सीखने के लिए प्रोत्साहित करता था। भारत की सनातन संस्कृति के स्वाभानुसार यह विश्लेषणात्मक विवेचन आत्मकेंद्रित ना होकर इसमें सम्पूर्ण प्रकृति एवं मानवता का भी कुशलक्षेम शामिल होता था। और यह संभव होता था उन नैतिक मूल्यों से जो उसे सही और गलत का भेद कराते थे। किंतु समय के प्रवाह के साथ परिभाषाएं बदलीं तो नैतिक मूल्य कहीं पीछे छूटते गए।
यह सही है कि आज मानव सभ्यता ने जो मुकाम हासिल किया है वो उसकी अथक मेहनत का फल है, उसके निरंतर प्रयासों का परिणाम है तथा उसकी अनगिनत प्रयोगों की परिणीति है। अवश्य ही उसने कितनी बार हार का सामना किया होगा कितनी ही बार वो मायूस भी हुआ होगा लेकिन आगे बढ़ने की चाह ने उसे अपनी गलतियों से सीखकर एकबार फिर उठने के लिए प्रेरित किया होगा। हाँ ऐसा ही हुआ होगा तभी तो हम स्वयं को कल तक इतिहास में विज्ञान के सर्वोत्तम विकास के दौर में होने का श्रेय देते थे जो आज हमारे लिए अभिशाप बन गया है। कारण कि जो सबसे बड़ी भूल मानव से इस यात्रा में हुई वो ये कि उसका विश्लेषण केवल आत्मकेंद्रित रहा, निज लाभ हानि तक सीमित रहा सर्व हिताए सर्व सुखाये का भाव इससे लुप्त रहा।
 नैतिक मूल्यों के पतन के साथ ही मानवता और प्रकृति सरंक्षण जैसे भाव इस विवेचना से लुप्त होते गए। परिणामस्वरूप तरक्की की कभी ना खत्म होने वाली मानव की लालसा और विकास की अंधी दौड़ उसे इस वैज्ञानिक युग के उस मोड़ पर ले आई जहाँ वो सुपर कंप्यूटर, रोबोट, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, क्लोनिंग जैसे वैज्ञानिक चमत्कारों से उत्साहित हो प्रकृति तक को ललकारने लगा।
परिणाम,आज अमरीका और चीन एक दूसरे को इस वैश्विक महामारी के लिए जिम्मेदार बताने वाले ऐसे बयान दे रहे हैं जिन्हें शायद ही कभी पुष्ट किया जा सके।लेकिन ये बयान इतना इशारा तो कर ही देते हैं कि कोरोना वायरस मानव निर्मित एक जैविक हथियार है। अतः यह समय सम्पूर्ण मानव सभ्यता के लिए आत्मावलोकन के ऐसे अवसर में बदल जाता है जिसमें अनेक प्रश्नों के उत्तर खोजना हम सभी का दायित्व बन जाता है।
दरअसल मौजूदा परिस्थितियों में प्रश्न तो अनेक और अनेकों पर खड़े हो गए हैं। उन संगठनों पर भी खड़े हो गए हैं जो विश्व के देशों ने एक दूसरे के सहयोग से आपसी सामंजस्य स्थापित करते हुए अपने अपने आर्थिक पक्षों को ध्यान में रखकर बनाए थे लेकिन संकट की इस घड़ी में इन संगठनों का हर देश अकेला और बेबस खड़ा है। इन संगठनों के औचित्यहीन होने का इससे बड़ा सबूत क्या होगा कि जब इटली जैसा देश जो यूरोपीय संघ जैसे शक्तिशाली संगठन का सदस्य है,अपने देश में कोरोना से संक्रमित लोगों के जीवन की रक्षा तो छोड़िए मृत्यु उपरांत उनके शवों को सम्मान जनक अंतिम संस्कार का एक सामान्य अधिकार भी नहीं दे पा रहा था, मदद के लिए यूरोपीय संघ के सदस्य देशों की तरफ आशाभरी नज़रों से देख रहा था लेकिन उसके हाथ निराशा लगी क्योंकि इन संगठनों ने आर्थिक लाभ हानि से ऊपर उठकर कभी सोचा ही नहीं। इस घटना ने जितना इटली को झकझोर के रख दिया उससे ज्यादा उसने यूरोपीय संघ को बेनकाब कर दिया। ब्रिटेन पहले ही इस संघ से बाहर आ चुका है अब इटली के भीतर भी यूरोपीय संघ के विरोध में स्वर उठने लगे हैं।
इसी प्रकार पुनर्विचार का संकट तो विभिन्न देशों की उस वैश्विक अर्थव्यवस्था की सोच पर भी मंडराने लगा हैं जिसमें चीन के एक शहर से शुरू होने वाली एक बीमारी समूचे विश्व की ही अर्थव्यवस्था को ले डूबती है। निश्चित ही कोरोना का यह संकट देशों को अर्थव्यवस्था और आवश्यक वस्तुओं के मामले में एक दूसरे पर अत्यधिक निर्भरता की अपनी अपनी नीति का पुनर्निर्माण कर हर देश को आत्मनिर्भरता के लिए कदम उठाने के लिए प्रेरित करेगा।
लेकिन वो संगठन जो सम्पूर्ण विश्व में मानव के स्वास्थ्य के स्तर को बढ़ाने के लिए उपयुक्त दिशा निर्देश जारी करता है, कोविड 19 वैश्विक महामारी के दौरान उस विश्व स्वास्थ्य संगठन की भूमिका ने तो उसकी विश्वसनीयता पर ही प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। एकतरफ अमेरिका खुलकर इसकी आलोचना ही नहीं कर रहा बल्कि विश्व भर में इस महामारी को फैलने से रोकने की दिशा में लापरवाही के चलते उसने तो विश्व स्वास्थ्य संगठन को अमेरिका द्वारा दी जाने वाली फंडिंग ही रोक दी है। लेकिन दूसरी तरफ अमेरिका ने कोरोना के संक्रमण फैलने के खतरनाक तरीके और उसकी तीव्र गति से फैलने के बावजूद लॉक डाउन के कारण अर्थव्यवस्था को पहुंचने वाले नुकसान के चलते इसका फैसला लेने में देर कर दी।
परिणाम आज कोरोना से होने वाले संक्रमण और मौतें दोनों में अमेरिका विश्व में पहले क्रम में है। जाहिर है ऐसे फैसले लेते समय आर्थिक पहलू महत्त्वपूर्ण होता है और मानवीय संवेदनाओं के लिए कोई स्थान नहीं होता।

फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी प्रशासन के सूत्र मान रहे हैं कि कोरोना वायरस का प्रारंभिक ट्रांसमिशन याकि प्राकृतिक स्ट्रेन (naturally occurring strain) का अध्ययन चमगादड़ से मानव को ट्रांसफर होने, न होने पर प्रयोग लैब में पेशेंट जीरो (patient zero) पर हुआ और वह वुहान की आबादी में मिक्स हुआ। फॉक्स न्यूज में विशेषज्ञ गोडोर्न चांग ने अपने लेख में लिखा है- काफी चाइनीज मानते हैं कि कोरोना वायरस या तो जानबूझकर रिलीज किया गया या दुर्घटनावश लैब से निकला। लैब में कोरोना वायरस पर अध्ययन हो रहा था और यह उस मछली बाजार से ज्यादा दूर नहीं है, जिसे शुरुआत में महामारी फूटने का केंद्र बताया गया।

ब्रिटेन सरकार की इमरजेंसी कमेटी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पिछले रविवार को बताया कि – वायरस के नेचर (based on the nature of the virus) अनुसार सोचें तो वुहान लैब से वायरस निकलने की बात को अब खारिज नहीं किया जा सकता। यह संयोग यों ही नहीं कि वुहान में ही एक लेबोरेटरी है।(Perhaps it is no coincidence that there is a laboratory in Wuhan)

इस सब के संदर्भ में ट्रंप ने इस सप्ताह प्रेस ब्रीफिंग में कहा–हम इस भयावह स्थिति को ले कर हर पहलू पर व्यापक जांच करा रहे हैं। (we are doing a very thorough examination of this horrible situation) अमेरिकी विदेश मंत्री पोम्पियो का कहना है- हमें वुहान लैब को लेकर मालूम था कि वह बहुत संक्रमित मैटेरियल लिए हुए है- हमें पता था कि वे इस प्रोग्राम पर काम कर रहे हैं, कई देशों में भी प्रोग्राम हैं लेकिन जो देश खुले, पारदर्शी होते हैं वे कंट्रोल व सुरक्षित रखने की क्षमता रखते हैं। वे बाहरी ऑब्जर्वर से सलाह करके, उन्हें अनुमति देते हैं ताकि प्रोसेस व तरीका सही बना रहे। मैं सोच ही सकता हूं कि उस जगह ऐसा हुआ होगा।

सो, दुनिया में वुहान की लैब से वायरस फूटने की धारणा में बहुत कुछ कहा जाने लगा है और जान लिया जाए कि इस सबके जवाब में चीन की सरकार विश्व स्वास्थ्य संगठन को बली का बकरा बना रही है। चीनी विदेश मंत्रालय ने बयान दे कर दुनिया से कहा है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बता रखा है कि लेबोरेटरी से कोरोना वायरस आने का कोई प्रमाण नहीं है।


यही समझने वाली बात है कि उपर्युक्त सभी संदर्भ भले ही अलग अलग हैं और भिन्न भिन्न वैश्विक संगठनों के हैं जो सामान्य व्यापारिक गतिविधियों में एक दूसरे के पूरक थे परंतु ऐसे समय जब इनके सदस्य देशों को इनकी सहायता की सबसे ज्यादा आवश्यकता थी, ये कर्ण की विद्या के समान निष्प्रभावी हो गए, आखिर क्यों? उत्तर हम सभी जानते है। दरअसल इन सभी संगठनों की उत्पत्ति का एकमात्र उद्देश्य समस्त सदस्य देशों के व्यापारिक हित,उनकी अर्थव्यवस्था और नए अवसरों की तलाशतक सीमित था। उपभोग्तावादी और अवसरवादी संस्कृति की यही विडंबना है। उपयोगिता और अवसर समाप्त होते ही व्यक्ति हो संगठन हो या देश निरुपयोगी हो जाता है। इसमें भावनाओं और मानवता की कोई जगह नहीं होती। शायद इसलिए सक्षम से सक्षम सरकारें और बड़े से बड़े साम्राज्य आज इस आपदा के समय बौने हो गए हैं लेकिन भारत जैसा अपार जनसंख्या और सीमित संसाधनों वाला देश इस संकट से सफलता पूर्वक लड़ ही नहीं रहा बल्कि हाइड्रोक्लोरोक्विन और पेरासिटामोल जैसी आवश्यक दवाइयों की आपूर्ति विश्व के विभिन्न देशों को कर रहा है। क्योंकि यहाँ संवेदनाएँ भी हैं और मानवता भी है। यहाँ की सनातन संस्कृति में निःस्वार्थ सेवा, दया भाव, दान की महिमा, परोपकार का भाव और सभी के हित की मंगलकामना के संस्कार पूरे देश को एक ऐसे सूत्र में बांधकर रखते हैं जो विपत्ति के समय टूटने के बजाए और मजबूत हो जाते हैं। कल जब विश्व के मानचित्र पर विशाल जनसंख्या के साथ इस  विकासशील देश की कोरोना पर विजय का विश्लेषण किया जाएगा तो शायद विश्व के बुद्धिजीवी भारत के विजय के उस गूढ़ मूलमंत्र को समझ पाएँ जो इसकी सनातन संस्कृति में छिपे हैं। जिस प्रकार आज योग कोरोना से लड़ने वाला सर्वश्रेष्ठ शारीरिक व्यायाम और प्राणायाम हृदय एवं श्वसन तंत्र के लिए सर्वोत्तम व्यायाम स्वीकार किया जा चुका है, भारतीय संस्कृति के मूल्य और संस्कार भी विश्व कल्याण की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ अनुकरणीय आचरण के रूप में स्वीकार किए जाएंगे और यह आवश्यक भी है। क्योंकि अगर विकास की इस चाह में लोककल्याण के भाव रहे होते तो कोरोना महामारी से जूझ रहे देशों को चीन द्वारा मदद के नाम पर घटिया सामान की आपुर्ति की खबरें नहीं आतीं। इसी प्रकार विज्ञान के सहारे विकास की यात्रा में यदि सर्वहित की मंगलकामना भी शामिल रही होती तो कोई भी देश इतना विनाशकारी जैविक हथियार बनाना तो दूर उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता था।

भारत में वायरस का प्रकोप ज्यादा नहीं होगा क्योंकि भारत मूल रूप से शाकाहारी देश है। भारत में तो मौसम भी अब गर्म होता जा रहा है। इसलिए शायद हम बचे हुए हैं।….जनता-कर्फ्यू की सफलता अभूतपूर्व और ऐतिहासिक रही है। ….मुझे खुशी है कि हमारे सभी प्रमुख टीवी चैनल कोरोना-युद्ध लड़ने के लिए हमारे परम प्रिय बाबा रामदेवजी को योद्धा बनाए हुए हैं।…. आसन और प्राणायाम के साथ-साथ वायुशोधक औषधियों से हवन करने की प्रेरणा मोदी और रामदेव जनता को क्यों नहीं दे रहे हैं? – वास्तव में इस मौके पर भारत सारी दुनिया के लिए काफी बड़ा मददगार सिद्ध हो सकता है।….भारत में कोरोना उस तरह नहीं फैल सकता, जैसा कि वह इटली, फ्रांस, अमेरिका और स्पेन में फैला है। इन देशों के खाने में हमारे मसालों का उपयोग नहीं के बराबर होता है। हमारे मसाले ही हमारी औषधि हैं। ….भारतीय संस्कृति के इन सहज उपायों का लाभ सारे संसार को मिले, ऐसी हमारी कोशिश क्यों नहीं है….अगले दो हफ्तों में भारत कोरोना को मात देकर ही रहेगा।….अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रुस और चीन जैसी महाशक्तियां आज त्राहि-माम, त्राहि-माम कर रही हैं। ऐसे विकट समय में भारत विश्व की आशा बन कर उभर रहा है। ….भारत ने कोरोना के सांड के सींग जम कर पकड़ रखे हैं। वह उसे इधर-उधर भागने नहीं दे रहा है। ….भारत की स्वस्थता पर सारी दुनिया दांतों तले अपनी उंगली दबा रही है।

ध्यान रहे इस साल भारत सरकार के बजट में 67 हजार करोड़ रुपए से थोड़ा ज्यादा पैसा स्वास्थ्य के लिए आवंटित किया गया है। पिछले साल के संशोधित बजट के मुकाबले सिर्फ 5.7 फीसदी की बढ़ोतरी की गई। उससे पहले साल 15 फीसदी की बढ़ोतरी की गई। इसके बावजूद सरकार जीडीपी का डेढ़ फीसदी भी स्वास्थ्य पर खर्च नहीं कर रही है। दिल्ली और एकाध राज्यों के अपवाद को छोड़ दें तो बाकी राज्य भी इसी अनुपात में स्वास्थ्य पर खर्च करते हैं।

अगर भारत सरकार और राज्यों की सरकारें कोरोना वायरस के मौजूदा संकट से कुछ सबक लेती हैं व अमेरिका और यूरोपीय देशों की स्वास्थ्य सुविधाओं का आकलन करते हुए अपने बारे में तुलनात्मक अध्ययन कराती हैं तो पता चलेगा कि उसे इस समय अपनी स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की कितनी जरूरत है। सरकार अगर इस समय कोरोना के बहाने ही स्वास्थ्य सेक्टर में निवेश बढ़ाती है तो इसके दो फायदे होंगे। पहला फायदा तो यह होगा कि आगे आने वाली किसी भी महामारी से निपटने की पूर्व तैयारी हो जाएगी। यह न सोचा जाए कि कोरोना आखिरी महामारी है।

पिछले दो दशक में सार्स, मर्स, इबोला, एचआईवी, बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू जैसे अनगिनत वायरस दुनिया में पनपे हैं और हजारों लोगों की इनसे मौत हुई है। इसके अलावा प्राकृतिक और दूसरी मानव निर्मित आपदाएं अलग हैं। सो, पहला फायदा तो यह होगा कि भारत का स्वास्थ्य सिस्टम बेहतर होगा और किसी भी संकट से लड़ने के लिए तैयार होगा। दूसरा फायदा यह होगा कि पहले से चल रही आर्थिक मंदी में इससे अर्थव्यवस्था में थोड़ी तेजी आएगी।

जानकारों का कहना है कि इस समय भारतीय स्वास्थ्य सिस्टम में करीब छह लाख करोड़ रुपए के निवेश की जरूरत है। अगर सरकार इसे गंभीरता से लेती है और कोरोना से सबक सीख कर इसका आधा भी इसमें निवेश के बारे में सोचती है तो बड़ा फायदा हो सकता है। ध्यान रहे सरकार बुनियादी ढांचे के विकास में एक सौ लाख करोड़ रुपए के निवेश की बात करती रही है। रोड में दो लाख करोड़ रुपए के निवेश की चर्चा हरदम सुनाई देती है पर यह सुनने को नहीं मिलता है कि अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, नर्सिंग कॉलेज बनाने में दो लाख करोड़ रुपए का निवेश होगा या सरकार मेडिकल लैब बनाने पर इतने हजार करोड़ रुपए खर्च करेगी, रिसर्च में खर्च बढ़ाएगी, मेडिकल उपकरण बनाने वालों को प्रोत्साहन दिया जाएगा और दवाओं की फैक्टरियां लगेंगी।

भारत के हेल्थ सेक्टर की हकीकत सबको पता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन, डब्लुएचओ द्वारा बनाया गया शायद ही कोई पैमाना होगा, जिसको भारत पूरा करता है। डब्लुएचओ के मुताबिक प्रति एक हजार नागरिक पर दो डॉक्टर होने चाहिए पर भारत में यह आंकड़ा एक हजार नागरिक पर 1.34 डॉक्टर होने का है। इसे भी अगर ग्रामीण और शहरी इलाकों में अलग अलग बांटेंगे या दक्षिण और उत्तर व पूर्वोत्तर के राज्यों के आधार पर बांटेंगे तो पता चलेगा कि उत्तर व पूर्वोत्तर भारत और ग्रामीण इलाकों में प्रति एक हजार पर डॉक्टर की उपलब्धता एक भी नहीं है। सिर्फ चार या पांच राज्य हैं, जो इस पैमाने को पूरा करते हैं।

ऐसे ही प्रति एक हजार व्यक्ति पर भारत में बेड की उपलब्धता बहुत कम है। भारत में एक हजार आदमी पर 0.55 बेड हैं यानी करीब दो हजार लोगों पर एक बेड है। इसके उलट इटली में एक हजार लोगों पर 4.2 बेड हैं। अमेरिका में 2.8 और चीन में 4.3 बेड्स हैं। जब आप इसे इलाकेवार देखेंगे तो और भी हैरान करने वाला आंकड़ा है। जैसे बिहार में एक हजार की आबादी पर 0.11 बेड हैं यानी वहां दस हजार आदमी के पीछे एक बेड है। देश के 70 फीसदी इलाकों में राष्ट्रीय औसत से कम बेड्स हैं। लब्बोलुआब यह है कि भारत में डॉक्टर नहीं हैं, बेड्स नहीं हैं, आईसीयू बेड्स की और भी कमी है, स्वास्थ्य उपकऱण नहीं हैं, रिसर्च नहीं के बराबर है। 

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बेबाक पत्रकार रवीश कुमार को मिला ‘रैमॉन मैगसेसे’ पुरस्कार


बेबाक पत्रकार रवीश कुमार को मिला ‘रैमॉन मैगसेसे’ पुरस्कार

हिंदी पत्रकारिता जगत में अपनी अलग पहचान बना चुके NDTV के रवीश कुमार को बेस्ट अवार्ड से सम्मानित किया गया है. ये अवार्ड 2019 के ‘रैमॉन मैगसेसे’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इस अवार्ड को ‘रैमॉन मैगसेसे’ को एशिया का नोबेल पुरस्कार के नाम से जाना जाता है. यह पुरस्कार फिलीपीन्स के भूतपूर्व राष्ट्रपति रैमॉन मैगसेसे की याद में दिया जाता है.

आपको बता दें कि, सम्मान के लिए पुरस्कार संस्था ने ट्वीट कर बताया कि रवीश कुमार को यह सम्मान “बेआवाजों की आवाज बनने के लिए दिया गया है.” रवीश कुमार का कार्यक्रम ‘प्राइम टाइम’ ‘आम लोगों की वास्तविक, अनकही समस्याओं को उठाता है.” साथ ही प्रशस्ति पत्र में कहा गया की, ‘अगर आप लोगों की अवाज बन गए हैं, तो आप पत्रकार हैं.’ 

आपको बता दें कि, रवीश कुमार ऐसे छठे पत्रकार हैं जिनको यह पुरस्कार मिला है. इससे पहले अमिताभ चौधरी (1961), बीजी वर्गीज (1975), अरुण शौरी (1982), आरके लक्ष्मण (1984), पी. साईंनाथ (2007) को यह सम्मान मिल चुका है.

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28,000 और जवानों को कश्मीर में किया गया तैनात, हाई अलर्ट पर फोर्सेज


28,000 और जवानों को कश्मीर में किया गया तैनात, हाई अलर्ट पर फोर्सेज

हाल ही में जम्मू कश्मीर में 10,000 हजार अतिरिक्त जवानों की तैनाती के एक हफ्ते के भीतर बड़ा कदम उठाते हुए मोदी सरकार ने कश्मीर 28,000 और अतिरिक्त सुरक्षाबलों की तैनाती कर दिया है. इसके साथ ही सरकार ने सेना और वायुसेना को ऑपरेशनल अलर्ट पर रहने को कहा है.

जिसके चलते स्थानीय नागरिकों में पहचल शुरु हो गई है और लोगों ने तेजी से राशन पानी जुटाना शुरु कर दिया है. इस बीच राज्य के पूर्व सीएम उमर अब्दुल्ला ने सरकार के इस अप्रत्याशित कदम पर ट्वीट कर कहा कि “ऐसी कौन सी वर्तमान परिस्थिति है जिसके चलते केंद्र सरकार ने सेना और वायुसेना को ऑपरेशनल अलर्ट पर ऱखा हुआ है, निश्चित तौर पर यह मामला 35ए अथवा परिसीमन से जुड़ा नहीं हैं. अगर सच में इस तरह का कोई अलर्ट जारी किया गया है तो यह बिल्कुल अलग चीज है.”

खास बात यह है कि इन सभी सुरक्षाबलों की राज्य के अति संवेदनशील माने जाने वाले इलाकों में भारी मात्रा में तैनाती की गई हैं. इसके अलावा राज्य के सभी जगहों पर अर्धसैनिक बलों ने कब्जा कर लिया है और प्रदेश पुलिस सिर्फ प्रतीकात्मक बन कर रह गई है.

घाटी में इतनी अधिक मात्रा में सुरक्षाबलों की तैनाती को लेकर हमारे सूत्रों का कहना है कि सरकार 370 और 35ए को लेकर कुछ बड़ा करने की तैयारी कर रही है. हालांकि सरकार का कहना है कि सीमापार से आतंकवादी कश्मीर में बड़ा हमला करने की फिराक में हैं जिसके मद्देनजर किया है.

लेकिन राजनीति के जानकारों का मानना है कि सरकार यह सब ध्यान भटकाने के लिए कह रही है जबकि असल में सरकार कुछ अलग और बड़ा करने की तैयारी कर रही है.

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