भाजपा के लिए अलार्मिंग है ....


भाजपा के लिए अलार्मिंग है ....

-सुभाष चन्द्र


महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनाव परिणाम आ गया है। पार्टी की अपेक्षाओं के अनुरूप कहीं भी परिणाम नहीं आया है। महाराष्ट्र में भाजपा गठबंधन को पहले से कम सीटें आईं, तो हरियाणा ने सांसें फुला दी। मतगणना यानी 24 अक्टूबर को दोपहर तक भाजपा नेता कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थे। केंद्रीय गृहमंत्री व भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को अपना पूर्व निर्धारित कार्यक्रम रद्द करना पडा। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को दिल्ली तलब किया गया। दोपहर बाद जब हरियाणा में कुछ सम्मानजनक स्थिति बनी, तो भाजपा कार्यकर्ताओं ने मिठाई बांटनी शुरू की।
अब सवाल उठता है कि क्या हरियाणा ने भाजपा को चेता दिया है? चुनाव पूर्व ही यह बात लोगों के जेहन में थी कि मुख्यमंत्री मनोहर लाल खटटर जनता से स्वयं को कनेक्ट नहीं कर पाए। केवल मोदी के सहारे चुनाव में उतरने का यह जोखिम भी था। अब दिल्ली और झारखण्ड विधानसभा चुनाव होना है। दिल्ली में भाजपा को सबसे अधिक चुनौती मिलने वाली है, क्योंकि वह यहां महज 4 सीटों के सहारे विपक्ष में हैं। झारखंड में भी मुख्यमंत्री रघुबर दास के प्रति लोगों का गुस्सा कई बार सरेआम हो रहा है। वहां मुख्य विपक्षी दल झारखंड मुक्ति मोर्चा लगातार जनता से कनेक्ट करने की हर संभव कोशिश करती है।
बहरहाल, हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा के चुनावी नतीजे आने के बाद भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली में बैठक की। भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक में दोनों राज्यों के विधानसभा और विभिन्न राज्यों के उप चुनावों के नतीजों की समीक्षा की गई। मोदी की मौजूदगी में हुई इस बैठक में पार्टी ने हरियाणा और महाराष्ट्र में फिर सरकार बनाने का फैसला किया।
बैठक के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसी शाम भाजपा मुख्यालय में पार्टी कार्यकर्ताओं को साफ संकेत देते हुए कहा कि उन्हें विश्वास है कि देवेंद्र फड़नवीस और मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व में महाराष्ट्र और हरियाणा अगले 5 साल में विकास की नई ऊंचाइयों को प्राप्त करेंगे। मोदी ने महाराष्ट्र और हरियाणा की जीत को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों के सबका साथ, सबका विकास, की राह पर चलने से लोगों ने उन पर दोबारा विश्वास जताया। मोदी ने कहा कि हरियाणा में पहले दूसरे दलों के रहमोकरम पर चुनाव लड़ते थे, 2014 में सरकार बनाने में सफल रहे। दोबारा लोगों का विश्वास पाना बहुत बड़ी बात है। दोनों राज्यों के संदर्भ में उन्होंने कहा कि भाजपा के मुख्यमंत्री भी नए थे, टीम भी नई थी। ऐसे में हरियाणा की भाजपा को जितनी बधाई दी जाए उतनी कम है। महाराष्ट्र को लेकर उन्होंने कहा कि 2014 से पहले वे जूनियर पार्टनर होते थे। इससे पहले पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने इस जीत के लिए मोदी को श्रेय दिया। हालांकि इससे पहले भाजपा मुख्यालय में महाराष्ट्र विधानसभा की जीत की खुशी हरियाणा के चुनाव नतीजों से नदारद दिखी।
लोकसभा चुनाव के बाद पस्त पड़े विपक्ष में कुछ जान लौटी है। महाराष्ट्र और हरियाणा के मतदाताओं ने भाजपा को झटका दिया है। हालांकि दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार बन जाएगी पर उसकी सीटें पिछली बार से घट गई हैं और उसका वोट प्रतिशत भी कम हो गया है। महाराष्ट्र में भाजपा और उसकी सहयोगी शिवसेना को कुल 161 सीटें मिली हैं। हरियाणा में भाजपा को 40 सीटों से संतोष करना पड़ा है। पिछली बार भाजपा ने हरियाणा में 47 सीटें जीती थीं। इसी तरह महाराष्ट्र में अकेले लड़ कर भाजपा 122 सीटों पर जीती थी पर इस बार वह सिर्फ 101 सीट जीतने में कामयाब रही है। भाजपा की सहयोगी शिव सेना को भी पिछली बार की 63 के मुकाबले इस बार 60 सीटें मिली हैं।

दूसरी ओर हरियाणा में कांग्रेस व नई बनी पार्टी जननायक जनता पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया। महाराष्ट्र के चुनाव में इस बार सबसे शानदार प्रदर्शन शरद पवार की पार्टी एनसीपी ने किया। उसने 58 सीटें जीतीं। कांग्रेस को 40 सीटें मिलीं हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने 42 और एनसीपी ने 41 सीटें जीती थीं। इस तरह एनसीपी को 17 सीटों का फायदा हुआ है। महज 11 महीने पहले बनी जननायक जनता पार्टी ने हरियाणा में दस सीटें जीतीं। पिछले चुनाव में 15 सीट जीतने वाली कांग्रेस ने अपनी सीटें दोगुनी कर लीं। उसको 31 सीटें मिली हैं। निर्दलीय और अन्य के खाते में नौ सीटें गई हैं।

महाराष्ट्र में भाजपा और शिव सेना मिल कर सरकार बनाएंगे। दोनों की सीटों की संख्या 161 है, जबकि बहुमत का आंकड़ा 145 सीटों का है। हालांकि शिव सेना ने मंत्रालय के बंटवारे में फिफ्टी-फिफ्टी परसेंट के बंटवारे की मांग की है। माना जा रहा है कि शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे राज्य के उप मुख्यमंत्री बनेंगे। दूसरी ओर हरियाणा में भाजपा बहुमत के आंकड़े से दूर रह गई है पर माना जा रहा है कि निर्दलीय और कुछ अन्य के साथ मिल कर सरकार बनाएगी।

गौरतलब है कि 21 अक्टूबर को दोनों राज्यों में हुए मतदान के बाद आए एक्जिट पोल में महाराष्ट्र में भाजपा-शिव सेना गठबंधन को दो सौ से ज्यादा और हरियाणा में भाजपा को अकेले 83 सीटें मिलने तक का अनुमान जताया गया था। खुद भाजपा ने हरियाणा के लिए 75 सीटों का लक्ष्य तय किया था पर वह साधारण बहुमत से भी छह सीट दूर रह गई। महाराष्ट्र में भी उसकी ओर शिव सेना दोनों की सीटों की संख्या कम हुई। लोकसभा चुनाव में दोनों राज्यों में भाजपा ने बहुत शानदार प्रदर्शन किया था। पांच महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को बड़ा झटका लगा है। महाराष्ट्र में देवेंद्र फड़नवीस सरकार के पांच मंत्री चुनाव हारे हैं, जबकि हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर सरकार के आठ मंत्री चुनाव हारे हैं।
हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंदर सिंह हुड्डा ने कांग्रेस नेतृत्व की ओर से राज्य में नेतृत्व परिवर्तन में देरी किए जाने पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि अगर उनको थोड़ा समय और मिल गया होता तो कांग्रेस पूर्ण बहुमत हासिल कर सकती थी। उन्होंने भाजपा के 75 पार के नारे पर भी तंज किया। गौरतलब है कि भाजपा ने 90 में से 75 सीटें जीतने का दावा किया था पर वह 40 सीटों पर अटक गई।
गौरतलब है कि राज्य में कांग्रेस को 31 और जननायक जनता पार्टी को दस सीटें मिली हैं। उन्होंने गुरुवार को वोटों की गिनती के बीच सभी विपक्षी पार्टियों को एक साथ आकर सरकार बनाने की अपील की थी। हालांकि बाद में उन्होंने इस बात से इनकार किया कि जननायक जनता पार्टी के नेता दुष्यंत चौटाला को उपमुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव दिया गया है।
हरियाणा में कांग्रेस की चुनाव प्रबंधन समिति के प्रमुख भूपेंदर सिंह हुड्डा ने नतीजों के बाद कहा- हमें थोड़ा और समय मिलता तो पूर्ण बहुमत मिल जाता। जनादेश हरियाणा की भाजपा सरकार के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि सबको मिलकर एक मजबूत सरकार बनानी चाहिए। हुड्डा ने कहा कि दुष्यंत चौटाला को उपमुख्यमंत्री पद ऑफर करने जैसी अभी कोई बात नहीं है। इस बारे में बैठकर बात करेंगे। हुड्डा ने कहा- मेरी दुष्यंत चौटाला से कोई बात नहीं हुई है। सोनिया जी हमारी नेता हैं और उन्होंने फोन करके मुझे बधाई दी है। मुख्यमंत्री कौन होगा यह विधायक पार्टी और गठबंधन में बातचीत होगी। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार बहुत विफल रही है। हर वर्ग इनसे नाराज था। 2014 में 154 वादे किए थे, लेकिन कोई भी पूरा नहीं किया। भाजपा के मंत्रियों की हार हुई है इसलिए नैतिकता के आधार पर उनको खुद सरकार छोड़ देनी चाहिए और सरकार बनाने का प्रयास भी नहीं करना चाहिए।

महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव नतीजे भाजपा के राजनीतिक प्रयोगों के लिए भी झटका है। इन दोनों राज्यों में पिछली बार चुनाव जीतने के बाद भाजपा ने अब तक चलती रही परंपरा को तोड़ते हुए महाराष्ट्र में ब्राह्मण और हरियाणा में पंजाबी मुख्यमंत्री बनाया था। आमतौर पर महाराष्ट्र में मराठा और हरियाणा में जाट मुख्यमंत्री होता रहा है। अगर महाराष्ट्र में गैर मराठा बनाना है तो दलित और हरियाणा में गैर जाट में कोई ओबीसी मुख्यमंत्री होता था। पर भाजपा ने महाराष्ट्र में देवेंद्र फड़नवीस और हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाया।

इसकी नतीजा यह हुआ है कि राजनीतिक रूप से बेहद शक्तिशाली मराठों और जाटों ने अपने को एकजुट किया और ताकत दिखाई। हरियाणा में भाजपा समझ रही थी कि जाट वोट बटेंगे। कुछ वोट भूपेंदर सिंह हुड्डा की वजह से कांग्रेस के साथ जाएंगे तो कुछ ओमप्रकाश चौटाला की इनेलो और दुष्यंत चौटाला की जेजेपी के साथ जाएंगे। पर जाटों ने बहुत होशियारी से मतदान किया। उन्होंने भाजपा को हरा सकने वाले उम्मीदवार चुने और उनको वोट किया। भाजपा से जाटों की नाराजगी कैसी थी, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भाजपा सरकार के जाट मंत्रियों सहित तमाम बड़े जाट नेता हारे हैं। वित्त मंत्री कैप्टेन अभिमन्यु हारे तो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सुभाष बराला भी हारे और पूर्व केंद्रीय मंत्री बीरेंद्र सिंह की पत्नी प्रेमलता भी चुनाव हार गईं।

यहीं काम मराठों ने महाराष्ट्र में किया तभी शरद पवार की पार्टी पिछली बार से ज्यादा सीटें जीतने में कामयाब रही। भाजपा ने इसी तरह का प्रयोग झारखंड में भी किया है। वहां भी परंपरा से हट कर भाजपा ने गैर आदिवासी मुख्यमंत्री बनाया है। अगले दो महीने में वहां भी चुनाव होने वाले हैं। अगर महाराष्ट्र और हरियाणा की तरह राजनीतिक रूप से मजबूत समुदायों ने भाजपा का विरोध किया तो उसे लेने के देने पड़ेंगे। आदिवासी विरोध का खामियाजा भाजपा छत्तीसगढ़ में झेल चुकी है।
यह ठीक है कि महाराष्ट्र में सरकार बनाने लायक सीटें भाजपा गठबंधन को मिल गई हैं। हरियाणा में भी जोड़-तोड़ करके सरकार बनाना उसके लिए ज्यादा कठिन नहीं होगा। गोवा, कर्नाटक और अरुणाचल के उदाहरण हमारे सामने हैं लेकिन ऐसी सरकारें कितनी जन-सेवा कर पाएंगी, इसका अंदाजा हम लगा सकते हैं। उनके सिर पर अस्थिरता की तलवार बराबर लटकती रहती है। महाराष्ट्र में शिवसेना को भाजपा के मुकाबले बेहतर सफलता मिली है। उसकी कीमत वह जरुर वसूलेगी। वह तो अपना मुख्यमंत्री बनाना चाहती थी लेकिन शायद वह उप-मुख्यमंत्री का पद लेकर चुप हो जाए लेकिन यह निश्चित है कि उनमें तनाव सदा बना रहेगा। इसी आपसी कहा-सुनी का दुष्परिणाम इन दोनों पार्टियों को महाराष्ट्र की जनता ने भुगता दिया है।
दोनों प्रदेशों की जनता से ‘एक्जिट पोल’ वालों ने जो उम्मीदें रखी थीं, वे बिल्कुल गलत साबित हुई हैं और यह बात भी गलत साबित हुई है कि हमारी जनता भाजपा को सिर पर बिठाने के लिए मजबूर है। दोनों प्रदेशों की जनता ने दिखा दिया है कि वह मजबूर नहीं है। उसने भाजपा के कान उमेठ दिए हैं। उस पर भाजपा और कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का असर बिल्कुल भी नहीं दिखा। अगर वह दिखता तो कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो जाता और दोनों प्रदेशों में भाजपा को अपूर्व बहुमत मिल जाता। मोदी ने चुनाव के एक दिन पहले पाकिस्तान के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक का दांव मारा लेकिन वह बेकार हो गया और राहुल गांधी का जो हाल पहले था, वह अब भी जारी रहा।
दूसरे शब्दों में महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव प्रादेशिक नेतृत्व और प्रादेशिक मुद्दों पर ही हुए हैं। हरियाणा में जातिवाद की दस्तक भी जोरदार रही। अब दिल्ली प्रदेश के चुनाव सिर पर हैं। पता नहीं, भाजपा और कांग्रेस का यहां हस्र कैसा होगा। केंद्र सरकार के लिए अब कठिनाई का दौर शुरु हो गया है। आशा है, अब वह कुछ सबक लेगी।
यह जनादेश कैसे भाजपा के विरूद्ध है, इसे इस तथ्य से भी समझा जा सकता है कि महाराष्ट्र और हरियाणा दोनों जगह विपक्षी पार्टियों में से कम से कम कांग्रेस तो बिल्कुल ही दम लगा कर लड़ती नहीं दिख रही थी। चुनाव की घोषणा के बाद तक दोनों राज्यों में पार्टी का झंडा-बैनर उठाने वाले लोग नहीं थे। चुनाव की घोषणा से 44 दिन पहले कांग्रेस ने हरियाणा में नेतृत्व बदला था और अशोक तंवर को हटा कर कुमारी शैलजा को अध्यक्ष और किरण चौधरी को हटा कर भूपेंदर सिंह हुड्डा को विधायक दल का नेता बनाया था। मुंबई में भी ऐन चुनावों से पहले मिलिंद देवड़ा का इस्तीफा मंजूर हुआ था और मुंबई का नया अध्यक्ष बनाया गया था।
महाराष्ट्र में एनसीपी जरूर दम लगा कर लड़ रही थी पर वह लड़ाई अकेले मराठा क्षत्रप शरद पवार की थी। उनके सारे सेनापति पार्टी छोड़कर भाजपा में चले गए थे। इसके बावजूद कभी हार नहीं मानने वाली अपनी जिद के दम पर पवार ने चुनाव लड़ा और दिखाया कि कैसे लड़ने वाले की कभी हार नहीं होती। पर चाहे कांग्रेस की लड़ाई हो, शरद पवार की हो या दुष्यंत चौटाला की हो, इन तीनों भाजपा विरोधी पार्टियों की लड़ाई दीये और तूफान की लड़ाई की तरह थी। भाजपा के मुकाबले ये पार्टियां तैयारी, संसाधन, उम्मीदवार, प्रचार किसी मामले में टिक नहीं रही थीं। इसके बावजूद इन्होंने भाजपा को नाको चने चबवाए तो इसलिए क्योंकि जनता ऐसा चाहती थी। आम लोग ऐसा चाहते थे। उन्होंने भाजपा से अपनी नाराजगी जाहिर की।
यह जनादेश इस बात का संकेत है कि राष्ट्रवाद का मुद्दा भूख, गरीबी और बेरोजगारी से बड़ा मुद्दा नहीं है। यह भी जाहिर हुआ है कि लोग भले गाफिल दिखें पर वे अपने हितों को पहचानते हैं। उन्हें देशभक्ति, राष्ट्रवाद, पाकिस्तान जैसे मुद्दों से लंबे समय तक बरगलाए नहीं रखा जा सकता है। अंततः असली और जमीनी मुद्दों पर बात करनी होगी। सरकारों को नतीजे देने होंगे। हो सकता है कि यह जनादेश को कुछ ज्यादा पढ़ने का प्रयास लगे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों राज्यों की अपनी 15 सभाओं में पाकिस्तान, कश्मीर, अनुच्छेद 370, मां भारती के नाम का जिक्र किया और जिस तरह से वास्तविक आर्थिक संकट की अनदेखी की, उससे यह मानने में हिचक नहीं है कि भाजपा जिसे तुरूप का पत्ता समझ रही थी उसे लोगों ने पूरी तरह से खारिज कर दिया।

 

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संस्कृत है तो संस्कृति है!


संस्कृत है तो संस्कृति है!

देवनागरी लिपि लिखने तथा संस्कृत बोलने से बच्चों की जिह्वा तथा अंगुलियों का कड़ापन समाप्त हो जाता है और उनमें लचीलापन आ जाता है। यूरोपीय भाषाएं बोलने और लिखने में जिह्वा एवं अंगुलियों के कुछ भाग सक्रिय नहीं होते, जबकि संस्कृत में इन अंगों के अधिक भाग सक्रिय होते हैं।

 

स्पेन के एक छात्र ने वाराणसी में आकर संस्कृत की पढ़ाई की और इसमें पीएचडी करने के बाद अपन देश ही नहीं पूरे स्पेनिश बोले जाने क्षेत्र में संस्कृत का प्रचार प्रसार किया और उसने इसके पहले ही स्पेनिश से संस्कृत, संस्कृत से स्पेनिश का शब्दकोष भी लाया ताकि इस भाषा को आसानी से समझा जा सकता है। वह छात्र स्पेन का भारत में राजदूत भी रहा और अन्य राष्ट्र में कल्चर राजदूत भी रहा। यह सब कहने का मतलब इतना ही है कि आज भी संस्कृत में जो कुछ है शायद किसी और भाषा में उतना नहीं है।

 

संस्कृत : सभी भाषाओं की जननी

 

संस्कृत देव भाषा है। यह सभी भाषाओं की जननी है। विश्व की समस्त भाषाएं इसी के गर्भ से उद्भूत हुई हैं। वेदों की रचना इसी भाषा में होने के कारण इसे वैदिक भाषा भी कहा जाता है। यह भाषा अपनी दिव्य और दैवीय विशेषाओं के कारण आज भी उतनी ही प्रासंगिक एवं जीवंत है।

 

संस्कृत की इस समृद्धि ने पाश्चात्य विद्वानों को अपनी ओर आकर्षित किया। इस भाषा से प्रभावित होकर सर विलियम जोन्स ने 2 फरवरी, 1786 को ऐसियाटिक सोसायटी कोलकाता में कहा था, संस्कृत एक अद्भूत भाषा है। यह ग्रीक से अधिक पूर्ण, लैटिन से अधिक समृद्ध और अन्य किसी भी भाषा से अधिक परिष्कृत है। इसी कारण संस्कृत को सभी भाषाओं की जननी कहते हैं।

 

संस्कृत को प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा के अंतर्गत रखा जाता है और सभी भाषाओं की उत्पत्ति का सूत्रधार इसे माना जाता है। भाषाविद् मानते हैं कि सभी भाषाओं की उत्पत्ति का तार कहीं न कहीं से संस्कृत से जुड़ा हुआ है, क्योंकि वह सबसे पुरानी एवं समृद्ध भाषा है।

 

किसी भी भाषा की विकासयात्रा में उसकी यह विशेषता जुड़ी होती है कि वह भविष्य में विकसित होने की कितनी क्षमता रखती है। जिस भाषा में यह क्षमता विद्यमान होती है, वह दीर्घकाल तक अपना अस्तित्व बनाए रखती है। परंतु भाषा में उपर्युक्त विशेषता नहीं होती है, उसकी विकास यात्रा थम जाती है।

 

संस्कृत भाषा की अनगिनत विशेषताएं:

 

यह सच है कि संस्कृत भाषा आज प्रचलन में नहीं है, परंतु इसमें अनगिनत विशेषताएं मौजूद हैं। इन्हीं विशेषताओं को लेकर कंप्यूटर के क्षेत्र में प्रयोग चल रहा है। कंप्यूटर विशेषज्ञ इस तथ्य से सहमत हैं कि यदि संस्कृत को कंप्यूटर की डिजिटल अंक भाषा में प्रयोग करने की तकनीक खोजी जा सके तो भाषा जगत के साथ कंप्यूटर के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन देखे जा सकते हैं। जिस दिन यह परिकल्पना साकार एवं मूर्तरूप लेगी, एक नए युग का उदय होगा।

 

संस्कृत उदीयमान भविष्य की एक महत्वपूर्ण धरोहर है। अपने देश में संस्कृत वैदिक भाषा बनकर सिमट गई है। इसे विद्धानों एवं विशेषज्ञों की भाषा मानकर इससे परहेज किया जाता है। किसी अन्य भाषा की तुलना में इसे महत्व ही नहीं दिया जाता है,

 

क्योंकि वर्तमान व्यावसायिक युग में उस भाषा को वरीयता एवं प्राथमिकता प्रदान की जाती है, जिसका व्यावसायिक मूल्य सर्वोपरि होता है। कर्मकांड के क्षेत्र में इसे महत्व तो मिला है, परंतु कर्मकांड की वैज्ञानिकता का लोप हो जाने से इसे अंधविश्वास मानकर संतोष कर लिया जाता है, पर इस भाषा के महत्व को समझ कर इसका प्रयोग किया जाए, तो इससे अनगिनत लाभ हो सकते हैं।

 

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सेंट जेम्स इंडिपेंडेंट स्कूल, लंदन में संस्कृत की प्रसिद्धी

 

संस्कृत की विशिष्टता को समझकर लंदन की एक पाठशाला ने अपने जूनियर डिविजन में इसकी शिक्षा को अनिवार्य बना दिया है। लंदन में पाठशाला के अधिकारियों की मान्यता है कि संस्कृत का ज्ञान होने से अऩ्य भाषाओं को सीखने एवं संस्कृत का ज्ञान होने से अन्य भाषाओं को सीखने एवं समझने की क्षमता में अभिवृद्धि होती है।

 

इसको सीखने से गणित एवं विज्ञान को हल करने एवं समझने में आसानी होती है। सेंट जेम्स इंडिपेंडेंट स्कूल नामक यह विद्यालय लंदन के कैनिंगस्टर ओलंपिया क्षेत्र की डेसर्स स्ट्रीट में अवस्थित है। पांच से दस वर्ष तक की आयु के इसके अधिकांश छात्र कॉकेशियन हैं। इस विद्यालय की आरंभिक कक्षाओं में संस्कृत अनिवार्य विषय के रूप में सम्मिलित हैं।

 

इस पाठशाला के शिक्षकों ने अनेक शोध परीक्षण करने के पश्चात अपने निष्कर्ष में पाया कि संस्कृत का ज्ञान बच्चों के सर्वागीण विकास में सहायक होता है। संस्कृत जानने वाला छात्र अन्य भाषाओं के साथ ही गणित, विज्ञान एवं कंप्यूटर आदि की शीघ्रता से सीख जाता है।

 

यह निष्कर्ष उस विद्यालय के विगत बारह वर्ष के अनुभव से प्राप्त हुआ है। संस्कृत अपनी विशिष्ट ध्वन्यात्मकता के कारण प्रमस्तिष्कीय (सेरेब्रल) क्षमता में वृद्धि करती है। इससे सीखने की क्षमता, स्मरणशक्ति, निर्णय क्षमता में आश्चर्यजनक अभिवृद्धि होती है।

 

संभवतः यही कारण है कि पहले बच्चों में विद्यारंभ संस्कार कराया जाता था और उसमें मंत्र लेखन के साथ बच्चे को जप करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता था। संस्कृत से छात्रों की गतिदायक कुशलता मोटर स्किल्स भी विकसित होती है। संस्कृति की रक्षा एवं विकास के लिए संस्कृत को महत्व प्रदान करना आवश्यक है। इस विरासत को हमें फिर से शिरोधार्य करना होगा, तभी इसका विकास एवं उत्थान संभव है।

 

 

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क्या भूखमरी का कोई इलाज है


क्या भूखमरी का कोई इलाज है

-चिरंजीत शर्मा , एडवोकेट

विश्व भूखमरी का इंडेक्स विश्व के पटल पर प्रस्तुत किया गया और 119 देशों में भारत को 102 से नवाजा गया, इंडेक्स के अनुसार भारत में आजादी के 74 साल के बाद भी लगभग 31 प्रतिशत जनसंख्या भूखमरी में जीती है, पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल की स्थिति भी भारत से बहुत बेहतर है जबकि सरकार के अनुसार अगर विकास की गंगा कहीं बह रही है तो वह भारत देश ही है। लेकिन वो विकास किस तरह का है मेरी समझ में नहीं आता क्योंकि देश एक घर है और सरकार घर की मुखिया और जब भी कोई भी घर विकास करता है तो सबसे पहले उसके घर के सभी सदस्यों को दो टाइम की रोटी जरुर मिलती है लेकिन जहां 30 प्रतिशत जनता को रोटी ही ना मिले वो देश कितना विकास कर रहा होगा ये सभी को विचार करना चाहिए।और वो भी तब जब जिस देश का संविधान का आधार है कि सबको पेट भर भोजन देने की व्यवस्था सरकार का प्रथम कर्तव्य होगा। और उसके बाद जिस देश के संसद में भोजन उपलब्धता कानून के ऊपर बहस करके कानून पास किया गया हो जिसका मूल उद्देश्य हर नागरिक को भोजन उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी होगी, उसके बाद 119 देशों में भारत का भूखमरी में 102 वां स्थान विश्व के पटल पर हमारा कितना मान बढ़ा रहे हैं। ये विचार करने योग्य है विचार जरूर करें।

 

दोस्तों भारतीय संस्कृति के अनुसार

 

हमे बेजान वस्तुओं के साथ भी इंसानों जैसा ही व्यवहार करना चाहिए,  इससे हमारी सुचिता  प्रतीत होने लगती है। जब कोई बेजान वस्तुओं, मानव,पशु पक्षियों, पेड़-पौधों के साथ  प्रेमपूर्ण होता है, तो इससे अंतस की पवित्रता की पुष्टि होती है, यह हमारे सहज और सरल होने का परिचायक है, इससे मानव होने का प्रबल आभास होता है। मानस की यही अवस्था महानता का प्रतीक है। इसीलिए किसी बेजान वस्तु के साथ ग़लती से भी यदि दुर्व्यवहार हो जाये तो उससे भी माफ़ी माँग ली जानी चाहिए, इससे वह वस्तु तो कुछ न बोल सकेगी, पर हम इंसान है, इसकी पुष्टि आवश्य हो जायेगी, और यही मन की स्थिति एक दिन हमे महान बनाने मे सहायक होगी, इसी से हमारे होने की, हमारे बीईंग की पुष्टि होगी। और जब हमारा बीईंग शुद्ध होगा, पवित्र होगा, तो ही हमारा सत्य से साक्षात्कारः होगा। यही स्थिति आनन्द की स्थिति है, और यही परम स्थिति है। लेकिन शायद आज भारत में इसकी बहुत कमी है तभी तो सरकार के साथ हमें अपने भूखे देश वासी दिखाई नहीं देते और यदि दिखाई देते हैं तो हमारी संवेदनशीलता कहा चली गई है विचार करें।

 

पिछले दिनों हमारे भारतीय मूल के एक अर्थशास्त्री को नोबल से नवाजा गया है और हम और सबसे पहले सरकार ने अपने आपको महान बताते हुए खुद अपनी पीठ थपथपायी भी दूसरी ओर से ख़बर आती है कि हमारे ही देश के एक नागरिक ने अपने बैंक के अव्यवस्थित वितीय प्रबंध के चलते अपनी जान गंवा दी है और तुरंत सरकार के वित्त मंत्री ने सरकार की भूमिका से इनकार कर के तुरंत इस घटना से पल्ला झाड़ लिया है। हमें विचार करना है कि हमें  गर्व करना चाहिए या शर्म विचार जरूर करें। ये तो हम कर ही सकते हैं।

विश्व में भी  विकास करने की हौड लगी है और सभी देश अपनी सुविधानुसार विकास की दौड़ में अग्रसर है। तभी विश्व के सभी पत्रकार विकास का लेख लिखने के लिए एक देश से दूसरे देश में भागे फिर रहे हैं,  इसी विकास को देखने एक पत्रकार सिरिया पहुंचा और उस  पत्रकार ने उस सीरियाई लड़की से एक क्लिक के लिए मुस्कुराने के लिए कहा ... वह अपनी आँखों में सभी दर्द के साथ मुस्कुराई। यह तस्वीर एक घृणित और शर्मनाक युद्धरत दुनिया का प्रतीक है जिसमें हम रह रहे हैं  और हम नहीं जानते इससे फायदा किसका होगा, विचार जरूर करें।

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