पराली से वायु प्रदूषण या राजनैतिक प्रदूषण- चिरंजीत शर्मा


पराली से वायु प्रदूषण या राजनैतिक प्रदूषण- चिरंजीत शर्मा

पराली से प्रदूषण या राजनैतिक प्रदूषण इसके बारे में क्या कोई भी बात करने के लिए तैयार नहीं है या राजनीति देश में इतनी संवेदनशीलता को खो चुकीं हैं जिसमें उन्हें लोगों की जान से खेलने में भी कोई फर्क नहीं पड़ता। क्या लोगों के स्वास्थ्य से बढ़कर केवल सरकार बनाना या सरकारों की एक दूसरे को बदनाम करने की कोशिश रह गयी है।

 

क्या भारत के लोगों को अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए एक और आजादी की लड़ाई लड़नी होगी। नेताओं के भाषण और उनके हंसते चहरों से जनता क्या सोचें कि वो उनके स्वास्थ्य के साथ खेलने पर हंस रहे हैं या अपनी गंदी सोच पर ये अपने आप में उनके चरित्र पर प्रश्न चिन्ह लगाता है?

 

दोस्तों हम सुबह से लेकर शाम तक देश की सरकार से अपने आपको सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं सुन सुन कर पक चुके हैं क्योंकि जिस देश की राजनैतिक कार्य शैली इतनी गिर जाये जिसमें स्वास्थ्य आपातकाल को भी राजनेतिक अखाड़ा बना दिया जाय, जिसमें केवल चुनाव और चुनावी दांव के साथ साथ केन्द्र और राज्य सरकारों की विफलताओं के अलावा कुछ भी ना हो, जहां जनता और उनका स्वास्थ्य भी उस धुंध में कहीं खो गया, क्या ऐसे बनेंगे हम विश्व शक्ति विचार करें।

 

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मेरे दोस्तों हमने देश के जिम्मेदार नागरिक होने के नाते अपने प्रधानमंत्री की हर बात को स्वीकार किया और उनके हर फैसले के साथ आंख मींचकर चल देते हैं। लेकिन क्या उन्हें ये स्वास्थ्य आपातकाल दिखाई नहीं देता या उनके लिए भी सरकार बनाना और आने वाले दिल्ली के चुनाव हमारे स्वास्थ्य से ज्यादा मायने रखतें हैं.

 

अगर उनके लिए सरकार बनाना ही लोगों के स्वास्थ्य से ज्यादा जरूरी है तो देश की जनता कहां जाये जो उन्हें इस आपातकाल से निकाल सके उन्हें बताना होगा, आज हमारे देश के एक मंत्री दिल्ली में सकेतिक भूख-हड़ताल पर बैठ गये और वहां उन्होंने प्रदेश सरकार को इस आपातकाल के लिए कोसना शुरू कर दिया लेकिन उसी समय राष्ट्रीय न्यूज चैनल हरियाणा में भी इसी प्रकार की स्वास्थ्य आपातकाल होता दिखा रहे थे मैं पूछना चाहूंगा इन महानुभावों से वहां किस की सरकार है और अगर वहां उनकी सरकार है तो वहां उस आपातकाल से बचने के लिए उनकी सरकार ने क्या किया, 

 

शाय़द उन्हें मालूम नहीं होगा क्योंकि अगर इन लोगों की नजर में जनता का स्वास्थ्य इतना महत्वपूर्ण होता तो शायद वो अपना ये समय समस्या के समाधान करने में लगातें, हमें इसे याद रखना चाहिए,और इन्हें समझना चाहिए ये जो भी है इसी जनता के कारण है जिसके स्वास्थ पर ये अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं।

 

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दोस्तों इसमें प्रदेश सरकार की जिम्मेदारी भी कम नहीं है या यूं कहें कि इन्होंने भी संवेदनशीलता की इतनी कमी है कि इन्हें भी लोगों की स्वास्थ्य आपातकाल नहीं आने वाले चुनाव दिखाई देते हैं। क्योंकि ये अभी की नहीं हर साल की कहानी है, लेकिन सिवाय बयान बाजी के इन्होंने कोई भी काम ऐसा नहीं किया जो वास्तव में इसके प्रति इन्हें गंभीर साबित करें।

 

दोस्तों हमारे देश की सरकार हर रोज एक नया रक्षा सौदा कर रही है जिससे हमारे देश की सीमाएं सुरक्षित रहे रक्षा के आधार पर वह महत्वपूर्ण है लेकिन ये जो देश के अन्दर स्वास्थ्य युद्ध का आपातकाल है इससे होने वाले दुष्परिणाम और मौतें सरकार को दिखाईं नहीं देती या वो देखना नहीं चाहते और यदि उन्हें दिखाई देता है तो अभी देश की जनता की रक्षा के लिए इन्होंने कौन से उपकरण खरीदे जिससे इस आपातकाल से लड़ा जा सके

 

और यदि उनकी नजर में जनता के स्वास्थ्य का कोई मायने नहीं है तो ये उनकी देश की जनता के प्रति उनकी संवेदनशीलता को दर्शाता है। हमें इस पर विचार करना चाहिए और आवाज उठानी चाहिए ताकि ये सोयी हुईं सरकारें जाग सके और हम एक खुलें आसमान के नीचे एक स्वच्छ सांस ले सकें जो हमारा मौलिक अधिकार है।

 

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संस्कृत है तो संस्कृति है!


संस्कृत है तो संस्कृति है!

देवनागरी लिपि लिखने तथा संस्कृत बोलने से बच्चों की जिह्वा तथा अंगुलियों का कड़ापन समाप्त हो जाता है और उनमें लचीलापन आ जाता है। यूरोपीय भाषाएं बोलने और लिखने में जिह्वा एवं अंगुलियों के कुछ भाग सक्रिय नहीं होते, जबकि संस्कृत में इन अंगों के अधिक भाग सक्रिय होते हैं।

 

स्पेन के एक छात्र ने वाराणसी में आकर संस्कृत की पढ़ाई की और इसमें पीएचडी करने के बाद अपन देश ही नहीं पूरे स्पेनिश बोले जाने क्षेत्र में संस्कृत का प्रचार प्रसार किया और उसने इसके पहले ही स्पेनिश से संस्कृत, संस्कृत से स्पेनिश का शब्दकोष भी लाया ताकि इस भाषा को आसानी से समझा जा सकता है। वह छात्र स्पेन का भारत में राजदूत भी रहा और अन्य राष्ट्र में कल्चर राजदूत भी रहा। यह सब कहने का मतलब इतना ही है कि आज भी संस्कृत में जो कुछ है शायद किसी और भाषा में उतना नहीं है।

 

संस्कृत : सभी भाषाओं की जननी

 

संस्कृत देव भाषा है। यह सभी भाषाओं की जननी है। विश्व की समस्त भाषाएं इसी के गर्भ से उद्भूत हुई हैं। वेदों की रचना इसी भाषा में होने के कारण इसे वैदिक भाषा भी कहा जाता है। यह भाषा अपनी दिव्य और दैवीय विशेषाओं के कारण आज भी उतनी ही प्रासंगिक एवं जीवंत है।

 

संस्कृत की इस समृद्धि ने पाश्चात्य विद्वानों को अपनी ओर आकर्षित किया। इस भाषा से प्रभावित होकर सर विलियम जोन्स ने 2 फरवरी, 1786 को ऐसियाटिक सोसायटी कोलकाता में कहा था, संस्कृत एक अद्भूत भाषा है। यह ग्रीक से अधिक पूर्ण, लैटिन से अधिक समृद्ध और अन्य किसी भी भाषा से अधिक परिष्कृत है। इसी कारण संस्कृत को सभी भाषाओं की जननी कहते हैं।

 

संस्कृत को प्रोटो इंडो यूरोपियन भाषा के अंतर्गत रखा जाता है और सभी भाषाओं की उत्पत्ति का सूत्रधार इसे माना जाता है। भाषाविद् मानते हैं कि सभी भाषाओं की उत्पत्ति का तार कहीं न कहीं से संस्कृत से जुड़ा हुआ है, क्योंकि वह सबसे पुरानी एवं समृद्ध भाषा है।

 

किसी भी भाषा की विकासयात्रा में उसकी यह विशेषता जुड़ी होती है कि वह भविष्य में विकसित होने की कितनी क्षमता रखती है। जिस भाषा में यह क्षमता विद्यमान होती है, वह दीर्घकाल तक अपना अस्तित्व बनाए रखती है। परंतु भाषा में उपर्युक्त विशेषता नहीं होती है, उसकी विकास यात्रा थम जाती है।

 

संस्कृत भाषा की अनगिनत विशेषताएं:

 

यह सच है कि संस्कृत भाषा आज प्रचलन में नहीं है, परंतु इसमें अनगिनत विशेषताएं मौजूद हैं। इन्हीं विशेषताओं को लेकर कंप्यूटर के क्षेत्र में प्रयोग चल रहा है। कंप्यूटर विशेषज्ञ इस तथ्य से सहमत हैं कि यदि संस्कृत को कंप्यूटर की डिजिटल अंक भाषा में प्रयोग करने की तकनीक खोजी जा सके तो भाषा जगत के साथ कंप्यूटर के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन देखे जा सकते हैं। जिस दिन यह परिकल्पना साकार एवं मूर्तरूप लेगी, एक नए युग का उदय होगा।

 

संस्कृत उदीयमान भविष्य की एक महत्वपूर्ण धरोहर है। अपने देश में संस्कृत वैदिक भाषा बनकर सिमट गई है। इसे विद्धानों एवं विशेषज्ञों की भाषा मानकर इससे परहेज किया जाता है। किसी अन्य भाषा की तुलना में इसे महत्व ही नहीं दिया जाता है,

 

क्योंकि वर्तमान व्यावसायिक युग में उस भाषा को वरीयता एवं प्राथमिकता प्रदान की जाती है, जिसका व्यावसायिक मूल्य सर्वोपरि होता है। कर्मकांड के क्षेत्र में इसे महत्व तो मिला है, परंतु कर्मकांड की वैज्ञानिकता का लोप हो जाने से इसे अंधविश्वास मानकर संतोष कर लिया जाता है, पर इस भाषा के महत्व को समझ कर इसका प्रयोग किया जाए, तो इससे अनगिनत लाभ हो सकते हैं।

 

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सेंट जेम्स इंडिपेंडेंट स्कूल, लंदन में संस्कृत की प्रसिद्धी

 

संस्कृत की विशिष्टता को समझकर लंदन की एक पाठशाला ने अपने जूनियर डिविजन में इसकी शिक्षा को अनिवार्य बना दिया है। लंदन में पाठशाला के अधिकारियों की मान्यता है कि संस्कृत का ज्ञान होने से अऩ्य भाषाओं को सीखने एवं संस्कृत का ज्ञान होने से अन्य भाषाओं को सीखने एवं समझने की क्षमता में अभिवृद्धि होती है।

 

इसको सीखने से गणित एवं विज्ञान को हल करने एवं समझने में आसानी होती है। सेंट जेम्स इंडिपेंडेंट स्कूल नामक यह विद्यालय लंदन के कैनिंगस्टर ओलंपिया क्षेत्र की डेसर्स स्ट्रीट में अवस्थित है। पांच से दस वर्ष तक की आयु के इसके अधिकांश छात्र कॉकेशियन हैं। इस विद्यालय की आरंभिक कक्षाओं में संस्कृत अनिवार्य विषय के रूप में सम्मिलित हैं।

 

इस पाठशाला के शिक्षकों ने अनेक शोध परीक्षण करने के पश्चात अपने निष्कर्ष में पाया कि संस्कृत का ज्ञान बच्चों के सर्वागीण विकास में सहायक होता है। संस्कृत जानने वाला छात्र अन्य भाषाओं के साथ ही गणित, विज्ञान एवं कंप्यूटर आदि की शीघ्रता से सीख जाता है।

 

यह निष्कर्ष उस विद्यालय के विगत बारह वर्ष के अनुभव से प्राप्त हुआ है। संस्कृत अपनी विशिष्ट ध्वन्यात्मकता के कारण प्रमस्तिष्कीय (सेरेब्रल) क्षमता में वृद्धि करती है। इससे सीखने की क्षमता, स्मरणशक्ति, निर्णय क्षमता में आश्चर्यजनक अभिवृद्धि होती है।

 

संभवतः यही कारण है कि पहले बच्चों में विद्यारंभ संस्कार कराया जाता था और उसमें मंत्र लेखन के साथ बच्चे को जप करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता था। संस्कृत से छात्रों की गतिदायक कुशलता मोटर स्किल्स भी विकसित होती है। संस्कृति की रक्षा एवं विकास के लिए संस्कृत को महत्व प्रदान करना आवश्यक है। इस विरासत को हमें फिर से शिरोधार्य करना होगा, तभी इसका विकास एवं उत्थान संभव है।

 

 

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क्या भूखमरी का कोई इलाज है


क्या भूखमरी का कोई इलाज है

-चिरंजीत शर्मा , एडवोकेट

विश्व भूखमरी का इंडेक्स विश्व के पटल पर प्रस्तुत किया गया और 119 देशों में भारत को 102 से नवाजा गया, इंडेक्स के अनुसार भारत में आजादी के 74 साल के बाद भी लगभग 31 प्रतिशत जनसंख्या भूखमरी में जीती है, पाकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल की स्थिति भी भारत से बहुत बेहतर है जबकि सरकार के अनुसार अगर विकास की गंगा कहीं बह रही है तो वह भारत देश ही है। लेकिन वो विकास किस तरह का है मेरी समझ में नहीं आता क्योंकि देश एक घर है और सरकार घर की मुखिया और जब भी कोई भी घर विकास करता है तो सबसे पहले उसके घर के सभी सदस्यों को दो टाइम की रोटी जरुर मिलती है लेकिन जहां 30 प्रतिशत जनता को रोटी ही ना मिले वो देश कितना विकास कर रहा होगा ये सभी को विचार करना चाहिए।और वो भी तब जब जिस देश का संविधान का आधार है कि सबको पेट भर भोजन देने की व्यवस्था सरकार का प्रथम कर्तव्य होगा। और उसके बाद जिस देश के संसद में भोजन उपलब्धता कानून के ऊपर बहस करके कानून पास किया गया हो जिसका मूल उद्देश्य हर नागरिक को भोजन उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी होगी, उसके बाद 119 देशों में भारत का भूखमरी में 102 वां स्थान विश्व के पटल पर हमारा कितना मान बढ़ा रहे हैं। ये विचार करने योग्य है विचार जरूर करें।

 

दोस्तों भारतीय संस्कृति के अनुसार

 

हमे बेजान वस्तुओं के साथ भी इंसानों जैसा ही व्यवहार करना चाहिए,  इससे हमारी सुचिता  प्रतीत होने लगती है। जब कोई बेजान वस्तुओं, मानव,पशु पक्षियों, पेड़-पौधों के साथ  प्रेमपूर्ण होता है, तो इससे अंतस की पवित्रता की पुष्टि होती है, यह हमारे सहज और सरल होने का परिचायक है, इससे मानव होने का प्रबल आभास होता है। मानस की यही अवस्था महानता का प्रतीक है। इसीलिए किसी बेजान वस्तु के साथ ग़लती से भी यदि दुर्व्यवहार हो जाये तो उससे भी माफ़ी माँग ली जानी चाहिए, इससे वह वस्तु तो कुछ न बोल सकेगी, पर हम इंसान है, इसकी पुष्टि आवश्य हो जायेगी, और यही मन की स्थिति एक दिन हमे महान बनाने मे सहायक होगी, इसी से हमारे होने की, हमारे बीईंग की पुष्टि होगी। और जब हमारा बीईंग शुद्ध होगा, पवित्र होगा, तो ही हमारा सत्य से साक्षात्कारः होगा। यही स्थिति आनन्द की स्थिति है, और यही परम स्थिति है। लेकिन शायद आज भारत में इसकी बहुत कमी है तभी तो सरकार के साथ हमें अपने भूखे देश वासी दिखाई नहीं देते और यदि दिखाई देते हैं तो हमारी संवेदनशीलता कहा चली गई है विचार करें।

 

पिछले दिनों हमारे भारतीय मूल के एक अर्थशास्त्री को नोबल से नवाजा गया है और हम और सबसे पहले सरकार ने अपने आपको महान बताते हुए खुद अपनी पीठ थपथपायी भी दूसरी ओर से ख़बर आती है कि हमारे ही देश के एक नागरिक ने अपने बैंक के अव्यवस्थित वितीय प्रबंध के चलते अपनी जान गंवा दी है और तुरंत सरकार के वित्त मंत्री ने सरकार की भूमिका से इनकार कर के तुरंत इस घटना से पल्ला झाड़ लिया है। हमें विचार करना है कि हमें  गर्व करना चाहिए या शर्म विचार जरूर करें। ये तो हम कर ही सकते हैं।

विश्व में भी  विकास करने की हौड लगी है और सभी देश अपनी सुविधानुसार विकास की दौड़ में अग्रसर है। तभी विश्व के सभी पत्रकार विकास का लेख लिखने के लिए एक देश से दूसरे देश में भागे फिर रहे हैं,  इसी विकास को देखने एक पत्रकार सिरिया पहुंचा और उस  पत्रकार ने उस सीरियाई लड़की से एक क्लिक के लिए मुस्कुराने के लिए कहा ... वह अपनी आँखों में सभी दर्द के साथ मुस्कुराई। यह तस्वीर एक घृणित और शर्मनाक युद्धरत दुनिया का प्रतीक है जिसमें हम रह रहे हैं  और हम नहीं जानते इससे फायदा किसका होगा, विचार जरूर करें।

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