अहमद का कांग्रेस को जीरो पर टिकाने का खेल


अहमद का कांग्रेस को जीरो पर टिकाने का खेल

-रितेश सिन्हा, वरिष्ठ पत्रकार

नई दिल्ली।

 झारखंड में चुनाव की घोषणा से ठीक पहले महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावी नतीजों में भाजपा पहली नजर में काफी पीछे पहुंच गई थी। धारा 370 के राष्ट्रवादी घोषणा का असर उसके अपने चुनावों में टिकट वितरण में वफादारों की तरजीह में 370 की बनी फिजां को बर्बाद कर दिया। हरियाणा में भाजपा के मुख्यमंत्री और सूबे के जमीनी नेता माने जाने वाले अनिल विज को छोड़कर सभी मंत्री मैदान में चित हो गए थे।

 

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वहीं महाराष्ट्र में शिवसेना को मुंबई और मराठवाड़ा को समेटने का मंसूबा पालने वाले अमित शाह को करारा झटका लगा। गठबंधन के साथ चुनावों में जाने वाली ये दोनों दल भाजपा और शिवसेना, चुनावों में एक-दूसरे को धक्का देकर पीछे करते नजर आए। नतीजा सामने है और सरकार बनने में और राष्ट्रपति शासन लागू करने में कुछ घंटों का वक्त बचा है।

 

अमित शाह और नरेंद्र मोदी के भाजपा में विरोधी बनकर उभरे नितिन गडकरी की सियासी चालों का आकलन हो रहा है। गडकरी की ठाकरे परिवार से नजदीकी और संघ के दवाब के बाद महाराष्ट्र की राजनीति फडनवीस को दिल्ली और गडकरी को महाराष्ट्र की राजनीति में फिट करने के साथ आगे बढ़ रही है।

 

आपको बता दें कि कांग्रेस का अहमद धड़ा अपना खेल आगे बढ़ा रहा है। पहले तो शिवसेना को सामने से समर्थन देने पर महाराष्ट्र में अहमद गैंग, जिसकी अगुवाई अशोक चव्हान करते रहे हैं, के साथ पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हान और बालासाहेब थोराट कांग्रेस अध्यक्ष पर दवाब बना रहे थे। सोनिया गांधी इन नेताओं से मिली जरूर, मगर सरकार में शामिल होने और समर्थन देने के मुद्दे पर इंकार कर दिया।

 

अहमद ने अपना प्लान बी फेंकते हुए एनसीपी में अपने चहेते प्रफुल्ल पटेल के जरिए शरद पवार को आगे बढ़ने की लाइन दे दी ताकि गठबंधन के दवाब में एनसीपी को समर्थन देना कांग्रेस की मजबूरी बन जाती। लेकिन शिवसेना में पवार विरोधी तेवर और मुख्यमंत्री पद पर अपना दावा रखने की वजह से एनसीपी सुप्रीमो को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

 

इसके बाद कांग्रेस के कोषाध्यक्ष ने गडकरी को बिना बुलाए समर्थन देने पहुंचे। नितिन गडकरी को उस आंकड़े तक पहुंचाने की पेशकश कर बैठे जिसमें 105 $ निर्दलीय, बाकी कांग्रेसियों को दल-बदल कराकर मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब दिखा आए। अहमद की गुपचुप हो रही इस मुलाकात को गडकरी ने अपने विश्वासपत्र पत्रकार मित्रों को खबर देकर आम कर दिया। इसके बाद कांग्रेसी आलाकमान और सतर्क हो गया। हालांकि सरकार बनाने की इस दौर में वो किसानों के मुद्दों को लेकर अपने ऊपर हो रहे हमलों को शांत करने की कोशिश करते दिखे।

 

किसानों के मुद्दे पर प्रधानमंत्री और कृषिमंत्री और गृहमंत्री का मसला तो समझ में आ सकता है, लेकिन गडकरी के साथ किसानों के मुद्दे पर बात करने के मामले को मीडिया में उछालना किसी के गले नहीं उतर रहा। हालांकि अहमद ने इस मामले को ठंडा करने के लिए कुछ चुनींदा पत्रकारों के जरिए मैनेज करने का प्रयास किया जो कुछ हद तक सफल भी रहा।

 

झारखंड में भी अहमद अपना कमाल दिखा चुके हैं। झारखंड के दो-दो प्रदेश अध्यक्ष और अहमद के प्यादे के तौर पर पहचान बनाए सुखदेव भगत और डा अजय कुमार आज पार्टी बदल चुके हैं। एक ने भाजपा और दूसरे ने आप का झंडाबरदारी कुबूल कर लिया। झारखंड से कई दिग्गज जिसमें कांग्रेस विधायक दल के नेता रहे मनोज यादव समेत भाजपा का दामन थाम चुके हैं।

 

प्रभारी आरपीएन सिंह ताकते रह गए और दिल्ली के एआईसीसी मुख्यालय में चुनींदा पत्रकारों के बीच हंसी-ठिठोली करते हुए हंसी-ठिठोली का पात्र हो गए। कांग्रेसी हाईकमान आरपीएन के हाईफाई हवा-हवाई खेल को समझ चुका है। उनके दिन अब गिनती के हैं। प्रियंका गांधी और राहुल गांधी के दौरों के बाद जो कुशीनगर लोकसभा चुनाव में इनकी गत बनी थी, उसी का फायदा अजय कुमार लल्लू को मिला।

 

लल्लू जमीनी नेता की हैसियत बनाने हुए प्रदेश के अध्यक्ष पद पर काबिज हो गए लेकिन हम नहीं सुधरेंगे की तर्ज पर राजा कहलवाने के आदी हो चुके ये नेताजी अब उसी क्षेत्र के प्रजा की भांति सड़क नापते हुए अगली बारी का इंतजार कर रहे हैं। कयास यही लग रहे हैं कि झारखंड के नतीजे इनको जल्द ऐसा मौका उपलब्ध करा देंगे। बतौर प्रभारी आरपीएन के कुप्रबंध का नतीजा है कि खांटी कांग्रेसियों ने भाजपा का दामन झारखंड में थाम लिया। रही सही कसर अहमद टिकटों के साथ चुनाव प्रबंधन में पूरा कर देंगे। फिलहाल झारखंड के दिग्गजों को आपस में भिड़ा चुके अहमद भाजपा, झामुमो, राजद के बाद चौथे नंबर का दल बनवाकर कर छोड़ेंगे।

 

राजद को बिहार में निबटा हुआ माना जा रहा है, मगर अहमद उनको ताकत देने पर आमदा हैं। बिहार के चुनावों जिस तरीके से टिकटों का खेल हुआ, उसका नतीजा सबके सामने है। गठबंधन के इकलौते सांसद बने जावेद की अपनी सबसे सुरक्षित सीट पर ही जमानत जब्त हो गई। चुनाव जीतकर बौरा गए जावेद सीमांचल के अलग राज्य की मांग को उठा रहे थे जिसका करारा जवाब इनको इनकी अपनी विधानसभा सीट पर मिल चुका है। इनको वो सभी सिपाहसलार जो इनके परिवार को जीत दिलाने में मददगार थे, उन्होंने ही कांग्रेस की आखिरी जमीन भी सुपुर्दे-खाक कर दी।

 

अहमद के गुजराती भाई और प्रभारी इस काम को अंजाम देने के लिए लगे हुए थे। भारी विरोध के बाद उन लोगों को टिकट दिया गया जिन्हें कांग्रेसियों ने मिलकर जिलाबदर कर दिया। विधानसभा के उपचुनावों में दो सीटों पर जीत ने राजद के नेतृत्व की नहीं, बल्कि जीतने वाले विधायकों की निजी जीत है। सुप्रीमो बने घूम रहे तेजस्वी की दोनों मीटिंगों में कुर्सी फेंकों सम्मान ने राजद के राजकुमार के हौंसले पस्त करने के लिए काफी थे। यही वजह रही कि तेजस्वी यादव कहीं चुनाव प्रचार करने तक नहीं गए थे।

 

झारखंड में झामुमो को बड़ा भाई मानने के बाद राजद को 12 से अधिक सीट देना कांग्रेस की जमीन खत्म करने का सुनियोजित षड्यंत्र माना जा रहा है। सुबोधकांत सहाय, गीताश्री उरांव, फुरकान अंसारी और प्रदेश अध्यक्ष रामेश्वर उरांव का सिरा अहमद के घर खुलता है। इन सभी नेताओं को आपस में भिड़ाकर अहमद पटेल आरपीएन समेत कांग्रेस का लुटिया डुबोने का इंतजाम कर चुके हैं।

 

कांग्रेसी हाईकमान बने राहुल गांधी को अहमद की टीम ने पूरे देश में मुकदमों के उलझा दिया। टपोरी टाइप बने प्रभारी कचहरी और कोर्ट का बेमतलब का चक्कर काट रहे हैं। बकायदा पटना पहुंचे राहुल गांधी को पीठासीन न्यायाधीश ने ऐसे मुकदमों में व्यक्तिगत रूप से पेश न होने का मशविरा भी दिया था। मगर अपनी राजनीति चमकाने के लिए ये प्रभारी पहुंच जाते हैं। ऐसे ही बिहार में कटिहार में पहुंचे प्रभारी को जिले के नेताओं ने ही उनका बहिष्कार ही कर दिया था।

 

महाराष्ट्र और हरियाणा के नतीजों से जहां कांग्रेसी बमबम है, वहीं कांग्रेस की बढ़ रही ताकत से अहमद खेमा बेचैन और चिंतित हैं। कांग्रेस के कोषाध्यक्ष की पूरी कोशिश फिलहाल तारिक अनवर को राष्ट्रीय राजनीति से बाहर रखने की थी, लेकिन हाईकमान उन्हें असम का पर्यवेक्षक बनाकर अपनी मंशा जाहिर कर चुका है। वहीं प्रदेशों के प्रभारी के ऊपर अलग से पर्यवेक्षक भेजकर प्रदेश में अहमद के वफादार बने प्रभारियों को चौंका दिया है।

 

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महाराष्ट्र और हरियाणा के नतीजों से आए परिवर्तन के बाद आलाकमान इन प्रभारियों के जरिए प्रदेशों में कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति और जमीनी हकीकत का आकलन करेगा। आने वाले दिन कांग्रेस में बड़े परिवर्तन के संकेत दे रहा है। पर्यवेक्षकों ने जिस मुस्तैदी से आंदोलन की रूपरेखा बनाई है, उससे कार्यकर्ताओं में खासा उत्साह दिख रहा है। आंदोलन की इस राजनीति में कांग्रेस की यह अंदरूनी राजनीति किस करवट बैठती है, इस पर राजनीतिक विश्लेषकों की निगाहें बनी हुई है।

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