छूट का अर्थशास्त्र


छूट का अर्थशास्त्र

-अनिता चौधरी

त्योहार आते ही सबसे पहले नजर बाजार की ओर जाता है। और बाजार भी इस त्योहार को ध्यान में रखकर पूरी तैयारी करता है। और अपनी ओर ग्राहकों को आकर्षित करता है। बाजार में तरह तरह के छूट इस समय आ जाते हैं। एक पर एक फ्री तो कहीं आधे दाम पर सामान ले जाओ तो कहीं एमआरपी से नीचे दामों पर सामान उपलब्ध। तो कहीं ईएमआई की सुविधा।

दरअसल बाजार को भी त्योहार का इंतजार रहता है जिस समय वे अपने सामान को निकाल सके। कंपनियों में कई ऐसे सामान होते हैं जिसे खरीदार किनारे कर देता है ऐसे में कंपनियों के पास यह समय होता है कि वे ऐसे सामान में छूट देकर अपनी कंपनियों का प्रचार के साथ वे इसे निकाल दे। त्योहार से बड़ा अवसर नहीं हो सकता है।

दरअसल त्योहार मुनाफे बढ़ाने का अवसर होता है तो ग्राहक भी कम से कम पैसा लगाकार फायदा चाहता है।

इस कड़ी में सबसे महत्वपूर्ण विज्ञापन होता है। विज्ञापन के जरिए ग्राहकों को लुभाया जाता है। यह कोशिश की जाती है कि इस मौके पर जो सामान साल भर में न बिका हो उसे भी बेच दे। हालांकि यह आसान नहीं होता है। इसके लिए खास रणनीति भी बनाई जाती है। कई कंपनियों के प्रॉडक्ट साल भर में नहीं बिकते हैं लेकिन मौके की तलाश में ऐसी कंपनियां लगी होती है जैसे कांटाबिल जो अपने नाम से विदेशी नजर आती है घाटे में चल रही थी लेकिन इसी त्योहार के समय से ही उसे रणऩीति सूझ गई और आज यह कंपनी फायदे में है। इसने त्योहार की रणनीति एक पर एक फ्री जैसे ऑफर आज इन्हें करोड़ों दे गया और इन्हें सूझा गया छूट का अर्थशास्त्र। दरअसल ग्राहकों इस तलाश में रहता है कि किसी भी प्रकार से इस मंहगाई में कुछ छूट मिले जिसका वे फायदा उठा सके। हालांकि उन्हें इसमें ख्याल नहीं होता है कि वे कितनी उत्तम सामान को खऱीद रहे हैं या कम टिकाऊ। कांटाबिल जैसी कंपनियों की आज भरमार है जो छूट के नाम पर ग्राहकों से ही ज्यादा वसूल लेती है। और ग्राहकों उनके लोकलुभावन पर फिदा हो जाता है।

बाजार रणनीति अपनाता है। वहां भी कम से कम लागत पर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की रणनीति पर काम करना होता है। अपनी रणनीति से बाजार को अपने पक्ष में कर लेना यही आधुनिक मार्केटिंग का आधार है। यही बात सर्वकालिक मार्केटिंग गुरु फिलिप कोटलर भी दोहराते रहे हैं। बाजार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है कि वो ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों को लुभाकर अपने पास ला सके और उनकी भारी जेब को हल्का कर सके। ग्राहकों को लुभाने की इस रणनीति के पीछे कम से कम लागत पर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की जुगत होती है।

ग्राहकों को लुभावने के लिए ऐसा वातावरण तैयार किया जाता है कि अगर कोई सामान नहीं खऱीद रहा हो तो ऐसा प्रतीत होता है कि कहीं कोई छूट रहा है और इसका पूरा फायदा लेने के लिए बाजार तैयार होता है। जैसे चमकने वाले लकड़ी के आलमीरा जो अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता जैसा दिखता है जिसका मूल्य बीस हजार रुपए होता है उसे दस हजार तक रख दिया जाता है। और इसका जोरदार प्रचार किया जाता है। ग्राहक ऐसे चमकते सामान की ओर तेजी से आकर्षित होता है जब उसे खऱीदकर ग्राहक लाता है तो उसे प्रतीत होता है कि इससे अच्छा तो लोहे की आलमीरा था जो कम जगह में ज्यादा सुरक्षित सामान रख सकते हैं लेकिन मार्केटिंग इतनी जोरदार इसकी की जाती है जिससे ग्राहक अपनी सुध बुध खोकर उसके पास जाता है लेकिन यह सामान दूसरे सीजन में जोर नहीं पकड़ता तो कंपनियां नई रणनीति अपनाती हैं और फिर से इस आलमीरा के साथ रसोई का सामान छूट में दे देता है जिसका ज्यादा उपयोग भी नहीं होता है लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि अगर होता तो शायद अच्छा होता। और ग्राहक इस लोकलुभावन छुट की वजह से आकर्षित हो जाता है।
 

 

त्योहार के अर्थशास्त्र का यह एक अहम पहलू है। जिस तरह से परिवार त्योहार के लिए बचत करता है, उसी तरह से बाजार भी उस बचत को ग्राहक की जेब से निकालने की रणनीति बनाता है। बाजार की यह रणनीति तीन सतहों पर की जाती है। बाजार में सबसे पहले किसी भी उपभोक्ता वस्तु का निर्माता होता है, फिर उसके बाद बिचौलिए का नंबर आता है और सबसे आखिर में थोक और खुदरा कारोबारी आते हैं। इस कड़ी में सबसे अहम भूमिका तीसरी और आखिरी कड़ी यानी खुदरा कारोबारी होता है। ग्राहकों को दुकान तक लाने का काम तो कंपनियों के स्तर से होता है जो वो विज्ञापन के जरिए करती हैं। किसी भी प्रोडक्ट का विज्ञापन देखकर ग्राहक उसकी तलाश में दुकान पर पहुंच जाता है। वो दुकान पर पहुंच कर उस खास प्रोडक्ट की जानकारी लेता है। ग्राहक को अगर रिटेलर अपनी जानकारी से संतुष्ट कर देता है या अपनी वाक्पटुता से उसे विश्वास दिलाने में कामयाब हो जाता है, तभी ग्राहक की जेब से पैसा निकलता है। दरअसल बाजार के इस पूरे खेल में हर स्तर पर मुनाफे का खेल खेला जाता है। निर्माता से लेकर बिचौलिया और फिर खुदरा कारोबारी बिक्री बढ़ाकर मुनाफा कमाना चाहते हैं तो ग्राहक सस्ते में खरीद लेने के एहसास से संतुष्ट होना चाहता है। हर कोई अपनी-अपनी जगह बाजार का अपने हक में इस्तेमाल कर फायदा चाहता है। कारोबारी शुद्ध मुनाफा चाहता है तो ग्राहक कम से कम फायदे का एहसास तो चाहता ही है। त्योहार के वक्त ही क्यों हम कह सकते हैं कि बाजार की सारी रणनीति का आधार ही मुनाफा होता है। त्योहार उस मुनाफे को बढ़ाने का एक अवसर देता है।
हम त्योहार को भुनाने की बाजार की रणनीति को देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि वो भगवान कृष्ण से प्रेरित है। यह तुलना थोड़ी अजीब लग सकती है। बाजार और बाजारवाद एक आधुनिक प्रवृत्ति है

 

बाजार भी यही रणनीति अपनाता है। वहां भी कम से कम लागत पर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की रणनीति पर काम करना होता है। अपनी रणनीति से बाजार को अपने पक्ष में कर लेना यही आधुनिक मार्केटिंग का आधार है। यही बात सर्वकालिक मार्केटिंग गुरु फिलिप कोटलर भी दोहराते रहे हैं। बाजार के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है कि वो ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों को लुभाकर अपने पास ला सके और उनकी भारी जेब को हल्का कर सके। ग्राहकों को लुभाने की इस रणनीति के पीछे कम से कम लागत पर ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की जुगत होती है।
पिछले कई सालों से अगर हम देखें तो भारत में त्योहार की जोरदार मार्केंटिंग शुरू हो गई है। हर त्योहार को लेकर पहले एक खास किस्म का वातावरण तैयार किया जाता है। इस विशेष माहौल को तैयार करने में विज्ञापन का अहम रोल होता है। माहौल इस तरह से तैयार किया जाता है कि लोगों को लगने लगता है कि अगर अमुक त्योहार पर अमुक उपभोक्ता वस्तु नहीं खरीदता तो कहीं कुछ छूट रहा है। इस काम में विज्ञापन के अलावा माउथ पब्लिसिटी का भी इस्तेमाल किया जाता है। किसी खास प्रोडक्ट के निश्चित समयावधि में खरीद नहीं करने या फिर किसी खास प्रोडक्ट को खास मौके पर खरीदने को शुभ बताकर प्रचारित करवा कर उसकी बिक्री बढ़ाने का उपक्रम किया जाता है। इसके दो बेहतरीन उदाहरण हैं। पितृ पक्ष के दौरान खरीददारी से बचने का माहौल और नवरात्र के दौरान जमकर खरीददारी का प्रचार। खासकर अगर हम देखें तो हमारे देश में गाडिय़ों की सबसे ज्यादा खरीददारी नवरात्र के दौरान होती है। ऑटोमोबाइल सेक्टर में मंदी के दौर में भी नवरात्र के दौरान गाडि़य़ों की खरीद में दो अंकों का इजाफा होता ही रहा है। एक अनुमान के मुताबिक पिछले दो साल से त्योहार के दौरान गाडि़य़ों की कुल सालाना बिक्री पंद्रह से बीस फीसदी नवरात्र से लेकर दीवाली तक होती है। इस वर्ष ऑटोमोबाइल सेक्टर का विकास दर नेगेटिव में है लेकिन फिर भी अनुमान है कि पिछले साल की तुलना में त्योहारों के मौके पर इस साल गाडि़य़ों ं की बिक्री का टर्न ओवर कम से कम तीन से चार फीसदी ज्यादा होगा। इसी तरह धनतेरस के मौके पर बर्तनों के अलावा सोने-चांदी की भी जोरदार खरीददारी होती है। धनतेरस के मौके पर छोटे से बाजार से लेकर बड़े-बड़े चमकदार मॉल्स में भी बर्तनों के बाजार सज जाते हैं। बड़े से लेकर छोटे सर्राफा कारोबारी अपनी क्षमता के मुताबिक धनतेरस के मौके पर सोने और चांदी की आसन्न बिक्री के मद्देनजर सोना-चांदी स्टॉक कर लेते हैं। इस मौके पर उनको कमाई की ज्यादा संभावना नजर आती है और होती भी है। जानकारों के मुताबिक हर साल त्योहार के मौके पर होने वाली सोने और चांदी की बिक्री में दस से पंद्रह फीसदी का इजाफा होता है। इस साल तो जानकार बीस फीसदी तक के इजाफे का अनुमान लगाए बैठे हैं।
हाल के वर्षों में बाजार ने शहरी मध्यवर्ग को ध्यान में रखकर रणनीति बनाई है और वो खूब सफल हुई है। दीवाली के मौके पर घर के बाहर रंगोली बनाने की समृद्ध परंपरा हमारे देश में रही है। परंपराओं और मान्यताओं के हिसाब से धन की देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए घर के दरवाजे पर रंगों से विभिन्न प्रकार की आकृतियां बनाई जाती हैं। उसमें सूखे रंगों का इस्तेमाल होता था और घर की महिलाएं और लड़कियां काफी वक्त लगाकर उसको जतन से तैयार करती थी। लेकिन शहरी मध्यवर्ग के समयाभाव को ध्यान में रखकर बना- बनाया रंगोली बाजार में लॉन्च किया गया। आलम यह है कि दीवाली के मौके पर सूखे रंगों की बिक्री कम हो गई। शहरों में तैयार रंगोली के स्टिकर के कारोबार ने रफ्तार पकड़ी। ये लगाना आसान, मेहनत बिल्कुल नहीं और फिर लंबे समय तक चिपके रहने की खूबी से ग्राहकों ने इसे हाथों हाथ लिया।

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